“साहू जी हैं कि मानते नहीं” आरटीआई की धज्जियां उड़ाते नेहरू डिग्री कालेज में पदस्थ साहू जी…. ?
आज से लगभग 23 वर्ष पहले एक बॉलीवुड की सुपर डुपर हिट फिल्म आई थी, जिसमे हीरो के अभिनय में आमिर खान ने शानदार भूमिका निभाई थी, शायद यह फिल्म थी “दिल है की मानता नहीं” ये फिल्म के टाइटल मध्य प्रदेश के शहडोल जिले के बुढार में स्थित शासकीय नेहरू डिग्री स्नातकोत्तर महाविद्यालय में अंगद की तरह पैर जमाए पूर्व बड़े बाबू और वर्तमान में पूरे शासकीय नेहरू महाविद्यालय का लेखा जोखा संभालने वाले एस पी साहू को इतनी मनभावक लगी की, साहू जी इसी फिल्म की तरह खुद को ढाल लिया है और अपनी मनमर्जी से शासकीय नियमों की धज्जियां उड़ाते रहते हैं और भला कोई नेता, राजनैतिक पार्टी या कोई भी छात्र संगठन के नेता इनके पैर हिला नही पाए है फिर चाहे वो कितना बड़ा भी तुर्रम खा क्यों न हो साहू जी की सेटिंग के सामने किसी की नहीं चलती। यहां तक कि इस शासकीय महाविद्यालय की प्राचार्य भी बिना साहू जी के एक कदम नहीं चल सकती है। खबर और जानकर सूत्रो से यह भी पता चला है की कालेज प्राचार्य महोदय केवल साहू जी के मर्जी से ही चलती और “बिन साहू सब सून” की कहानी चरितार्थ होती है।
प्रयोगशाला परिचायक को बना दिया लिपिक, साहू की विरासत संभालने को तैयार है पुत्र
*बुढार कालेज मे आरटीआई की धज्जियां उड़ाते है साहू जी*
बुढार कालेज में पदस्थ साहू जी की बादशाहत ऐसी है किवे शासकीय नियमों की धज्जियां उड़ाते रहते हैं खासकर सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी को तो साहू जी कुछ समझते ही नहीं है उन्हे हुई हैं। लगता है कि सूचना का अधिकार की जानकारी न देने से वो मैनेजमेंट करके बन जायेंगे, परंतु जानकारी लेना तो एक्टिविस्ट का काम है। अभी ताजा मामला यह है कि शासकीय महाविद्यालय में पदस्थ साहू जी और वर्मा जी ने पिछले माह लगी सूचना अधिकार के तहत जानकारी मांगी गई थी, सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी 17 सितंबर 2023 को निर्धारित प्रपत्र में चाही गई थी, परंतु ये आरटीआई का उत्तर आज दिनांक तक आवेदक को नहीं दिया गया है, बार बार जानकारी लेने पर महाविद्यालय के द्वारा यही विश्वास दिलाया जा रहा था कि आपको डाक द्वारा उत्तर दे दिया गया परंतु एक माह बीत जाने के बाद भी है न ही कोई डाक द्वारा जवाब आया और न ही कोई ज़वाय महाविद्यालय प्रशासन द्वारा दिया गया है। यह आरटीआई अखबार के प्रधान संपादक के द्वारा लगाई गई थी।
अब सोचने की बात तो यह है कि जब पत्रकारों के साथ ऐसा किया जा सकता है तो आम जनता की बात क्या होगी आप इसका अनुमान लगा सकते हैं परंतु शासकीय महाविद्यालय की प्राचार्य महोदय भी साहू जी के इस कृत्य के लिए खुली छूटने रखी है इसका प्रमुख कारण था आरटीआई के जवाब सवाल खुद प्राचार्य के थे तो क्या प्राचार्य की मिलीभगत से साहू केवल आर्थिक रूप से महाविद्यालय में कार्यरत हैं। या प्राचार्य महोदय साहू के हाथ की कठपुतली बनी
महाविद्यालय में पदस्थ साहू जी का सिस्टम इतना मजबूत है कि अपने दोनो बच्चो को महाविद्यालय में नौकरी भी लगा दी और दोनो को आसपास पदस्थ भी करा दिया हालाकि साहू जिनका एक सुपुत्र शासकीय महाविद्यालय बुढार में पदस्थ है परंतु साहू जी की बादशाहत ऐसी बनी हुई है कि इनके बेटे की भर्ती प्रयोगशाला परिचायक के रूप में हुई थी और उनको अप्रत्यक्ष रूप से बाबू मतलब लिपिक की कुर्सी से नवाजा जा रहा है।
*आखिर क्या था आरटीआई में, जिसकी जानकारी नहीं दी गई*
सूचना के अधिकार के तहत लगाई गई जानकारी के तहत आवेदक ब्रिजेंद्र गुप्ता ने जानकारी मांगी थी की शासकीय महाविद्यालय बुढार में वर्तमान पदस्थ प्राचार्य का नाम, उनकी शैक्षिणक योग्यता, भर्ती के समय का एपीआई स्कोर, रिसर्च पेपर, कांफ्रेंस, सेमिनार, प्लेगरिज्म रिपोर्ट, पीएचडी की थिसिस की कापी जैसी अहम जानकारी मांगी गई थीं परंतु आज दिनांक तकनीक जानकारी नहीं दी गई है और मुझे आशंका भी है कि मेरे आवेदन को साहू जी द्वारा जानबूझकर खारिज करने की साजिश की जा सकती है परंतु ये उपरोक्त सभी जानकारी सूचना अधिकार के तहत आती हैं। वही दूसरी ओर एक और आरटीआई एक्टिविस्ट मयंक पांडेय ने भी सूचना अधिकार के तहत जानकारी मांगी गई थी परंतु उन्हें भी जानकारी नहीं मिल रही है।
ब्रिजेंद्र गुप्ता आरटीआई कार्यकर्ता का कहना है कि “महाविद्यालय में पदस्थ साहू जी द्वारा जानबूझकर आरटीआई का कोई उत्तर नही दिया जाता है और आवेदको को घुमाया जाता है परंतु मैं इस बात को लेकर शहडोल कलेक्टर के समक्ष जन सुनवाई मे जाकर शिकायत भी करूंगा।”











