75 की उम्र में भी कायम है रजनीकांत का जलवा, जानिए क्यों बरकरार है थलाइवा का स्टारडम

जब भी रजनीकांत पर्दे पर आते हैं, सिनेमाघर महज थिएटर नहीं रहते, बल्कि किसी बड़े स्टेडियम में तब्दील हो जाते हैं. लोग वहां सिर्फ किसी स्टार की झलक पाने के लिए नहीं पहुंचते, बल्कि उस शख्सियत में अपना संघर्ष, अपनी उम्मीदें और अपनी जीत तलाशते हैं. क्योंकि वो हम ही जैसे दिखते हैं, बोलते हैं. गिरते हैं, संभलते हैं, लेकिन हर ठोकर के बाद और भी ज्यादा शान से खड़े हो जाते हैं. साल 1975 की 'अपूर्वा रागांगल' से लेकर 'जेलर 2' तक रजनीकांत ने साबित कर दिया है कि उम्र महज एक नंबर है और स्टारडम कोई तुक्का नहीं, बल्कि पक्के इरादों की दास्तां है.

हाल ही में रिलीज हुई रजनीकांत की फिल्म 'जेलर 2' ने दुनियाभर में 800 करोड़ रुपये का आंकड़ा पार कर लिया है और यह अब तक की 16वीं सबसे ज्यादा कमाई करने वाली भारतीय फिल्म बन गई है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि रजनीकांत का फिल्मी सफर किसी धमाकेदार एंट्री की तरह लॉन्च पैड से शुरू नहीं हुआ था. उन्होंने हाशिए से शुरुआत की थी.

तीखी नजरें, चेहरे की सख्त लकीरें और एक ऐसा खूंखारपन जो पर्दे पर आग लगा दे. 'अपूर्वा रागांगल' और '16 वयथिनिले' जैसी फिल्मों में उन्होंने ऐसे किरदार निभाए जो सब कुछ उलट-पलट कर रख दें. उनकी एक तिरछी मुस्कान या बैठने का अंदाज ही पूरे सीन पर भारी पड़ जाता था. उनके मुंह से निकला 'इदु एप्पडि इरुक्कु?' (यह कैसा है?) सिर्फ एक डायलॉग नहीं था, बल्कि दर्शकों के लिए एक खुली चुनौती थी कि वे लीक से हटकर कुछ देखने को तैयार हो जाएं.

'सुपरस्टार' बनने की इबारत
70 के दशक के आखिर में चीजें बदलीं और 'भैरवी' ने उन्हें सोलो हीरो के रूप में स्थापित कर दिया. 'बिल्ला' और 'मुरट्टू कालई' ने उन्हें बॉक्स ऑफिस का बेताज बादशाह बना दिया. लेकिन उनकी छवि कभी चमक-धमक वाली साफ-सुथरी नहीं रही; उन्होंने अपने किरदारों के खुरदरेपन को ही अपनी पहचान बनाया. सिगरेट उछालना, च्युइंग गम चबाना या कोट के कॉलर ठीक करना. उनका हर अंदाज एक इतिहास बन गया.

उनका स्टाइल हर पीढ़ी ने एक बार कॉपी जरूर किया है. 'एन वझी, थानी वझी' (मेरा रास्ता, मेरा अपना रास्ता है) सिर्फ पडैयाप्पा का डायलॉग नहीं, बल्कि रजनीकांत के जीने का सलीका बन गया. इसके इअलावा 'अन्नामलाई' फिल्म का एक डायलॉग उनके काम करने के उसूलों को बखूबी बयां करता है. 'नान सोलराथायुम सेइवेन, सोललाथाथायुम सेइवेन.' यानी, मैं जो कहता हूं वह तो करता ही हूं, लेकिन जो नहीं कहता, वह भी कर दिखाता हूं.

आम इंसान से जुड़े रहे, इसलिए खास बने
अगर उनकी सुपरहिट फिल्मों जैसे 'बाशा', 'मुथु', 'अन्नामलाई' या 'पडैयाप्पा' उठा कर देखें, तो सबकी कहानी एक ही बात कहती है. कोई भी फर्श से अर्श तक पहुंच सकता है. एक बस कंडक्टर का सुपरस्टार बन जाना इस बात का सबसे बड़ा सबूत है. रजनीकांत ने कभी खुद को आम जनता से अलग नहीं समझा. उन्होंने सिल्वर स्क्रीन पर आकर यह दिखाया कि हीरो दिखने में कैसे भी हो सकते हैं, बस इरादे मजबूत होने चाहिए. यही वजह है कि वे पोस्टरों के भगवान भी हैं और हर गली के नायक भी.

आप गौर करें तो समझेंगे कि जब दूसरे स्टार असल जिंदगी में दिखाई देते हैं तो वो अमूमन खुद के लुक पर खासा ध्यान देते हैं,. वो ठीक उसी तरह असल जिंदगी में भी दिखना चाहते हैं, जैसे वो पर्दे पर दिखते हैं. लेकिन इसके उलट रजनीकांत सभी को हैरान करते हैं. वो किसी हेयरविग का इस्तेमाल नहीं करते, बस धोती-कुर्ती और चप्पल. इसके जरिए वो अपने लोगों से कनेक्ट रहते हैं. लोगों को एहसास दिलाते हैं कि मैं आपके जैसा ही हूं.

लोगों को अक्सर लगता है कि रजनीकांत ने हमेशा सेफ गेम खेला है, लेकिन सच इसके बिल्कुल उलट है. 'शिवाजी: द बॉस' में भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग हो, 'एंथिरन' (रोबोट) में वैज्ञानिक और विलेन का डबल रोल, या फिर 'कोचादैयां' जैसी फिल्म में मोशन कैप्चर तकनीक का इस्तेमाल- उन्होंने हमेशा रिस्क लिया. 'कबाली' और 'काला' जैसी फिल्मों के जरिए उन्होंने खुलकर जाति और राजनीति जैसे गंभीर मुद्दों पर बात की. हर दौर में खुद को ढालना ही उनकी असली जीत है.

ये ही वजह है कि उनका फैनबेस पीढ़ियों से चला आ रहा है. दादा, पिता और बच्चे सभी उनके फैन रहे हैं. क्योंकि लोकेश कनकराज और नेलसन दिलीप कुमार जैसे युवा व नए निर्देशकों के साथ काम कर नई पीढ़ी (Gen Z और Millennials) के ऑडियंस से जुड़े. जेलर 2 (Jailer 2) जैसी फिल्मों की भारी सफलता इसका सबसे बड़ा उदाहरण है.

गिरने के बाद जबरदस्त कमबैक
रजनीकांत का करियर हमेशा एक सीधी लाइन में नहीं चला. बीच में कई उतार-चढ़ाव आए, फिल्में पिटी और लोगों ने शक करना शुरू किया. लेकिन हर बार उन्होंने जोरदार वापसी की. 'बाबा' के बाद 'कबाली' की सुनामी हो या हाल ही में 'जेलर 2' की ऐतिहासिक सफलता, उन्होंने हर बार खुदको साबित किया.

पर्दे के बाहर रजनीकांत बिल्कुल अलग इंसान हैं. जो शख्स स्क्रीन पर आंधी लाता है, वह असल जिंदगी में बेहद सादगी से पेश आता है, सिंपल कुर्ता और चप्पल पहनता है. अपनी ही बनाई इस लोकप्रियता और स्टारडम पर वे खुद हंसते हैं. अगर कॉलीवुड के इतिहास के पन्ने पलटें तो पहली 100 करोड़ से लेकर 800 करोड़ तक के क्लब का रास्ता इसी एक नाम से होकर गुजरता है.

'जेलर 2' की बंपर सफलता ने बता दिया कि 75 साल की उम्र में, रजनीकांत अब सिर्फ एक स्टार नहीं रह गए हैं. वे इस बात का जीता-जागता सबूत हैं कि आप कहीं से भी आकर, अपनी मेहनत, विश्वास और पक्के इरादे से पॉपुलर कल्चर की तस्वीर बदल सकते हैं. एक ऐसी इंडस्ट्री में जहां हर शुक्रवार को ट्रेंड बदल जाते हैं, रजनीकांत आज भी अपनी फिल्मों की ऐसी ओपनिंग दिलाते हैं जैसे वे अपने करियर के सबसे बेहतरीन दौर में हों.

आखिरी बात स्टार आते-जाते रहेंगे. लेकिन एक बात आज पहले से कहीं ज्यादा सच लगती है. 'थलाइवर निरंतरम' (Thalaivar nirandharam)- यानी, 'नेता' (थलाइवा) हमेशा के लिए हैं.  और उनकी फिल्म 'मुथु' का एक डायलॉग है. 'मैं कब आऊंगा, कैसे आऊंगा, यह कोई नहीं जानता… लेकिन जब सही समय आएगा, तो मैं जरूर आऊंगा.' पचास साल बाद भी, यह बात बिल्कुल सटीक बैठती है.

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