विश्वनाथ प्रताप सिंह : एक महानायक, जिसे सत्ता ने सज़ा दी और जातियों ने भुला दिया….

भारतीय इतिहास और राजनीति में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जिनका मूल्यांकन उनके जीवनकाल में नहीं हो पाता वे अपने समय से आगे होते हैं उनके निर्णयों की धूल बैठने में दशकों लग जाते हैं उनके बारे में तत्कालीन राजनीति बहुत कुछ कहती है, लेकिन इतिहास धीरे-धीरे बोलता है।

विश्वनाथ प्रताप सिंह ऐसे ही व्यक्तित्व थे।

उन पर जितना लिखा जाना चाहिए था, उतना नहीं लिखा गया जितना समझा जाना चाहिए था, उतना नहीं समझा गया जितना सम्मान मिलना चाहिए था, उतना नहीं मिला। भारतीय राजनीति के इस विलक्षण चरित्र को उसके समर्थकों ने भी सीमित किया और विरोधियों ने भी।

कुछ लोगों ने उन्हें केवल मंडल तक सीमित कर दिया, कुछ लोगों ने उन्हें केवल बोफोर्स तक कुछ ने उन्हें जातीय राजनीति के चश्मे से देखा और कुछ ने उन्हें सत्ता संघर्ष के एक पात्र के रूप मे लेकिन इन सबके बीच वह व्यक्ति कहीं खो गया जिसने अपने जीवन के हर महत्वपूर्ण मोड़ पर अपने हितों के विरुद्ध और सर्व समाज के हित में निर्णय लिए।

जरा ठहरकर उनके जीवन को देखिए।

वह किसी साधारण परिवार में जन्मे व्यक्ति नहीं थे। वह एक रियासत के उत्तराधिकारी थे। उनके पास वह सब कुछ था जिसके लिए सामान्य मनुष्य जीवन भर संघर्ष करता है प्रतिष्ठा, भूमि, वैभव और सामाजिक प्रभाव।

लेकिन इतिहास का सम्मान उन लोगों को नहीं मिलता जिन्हें सब कुछ विरासत में मिल जाता है।

इतिहास उन लोगों को याद रखता है जो विरासत से ऊपर उठ जाते हैं।

विश्वनाथ प्रताप सिंह ने अपनी पुश्तैनी जमीन का बड़ा हिस्सा गरीबों में बाँट दिया। यह कोई राजनीतिक नारा नहीं था, यह उनके जीवन का निर्णय था। वह समय ऐसा नहीं था जब कैमरे हर जगह मौजूद हों और दान को प्रचार में बदला जा सके यह एक आंतरिक नैतिक आग्रह था कि जिस समाज ने आपको सब कुछ दिया है, उसका ऋण भी चुकाया जाना चाहिए।

शायद यहीं से उनके भीतर का राजनेता नहीं, बल्कि लोकनायक जन्म लेता है।

फिर वह केंद्र की राजनीति में आते हैं।

वित्त मंत्री बनते हैं।

यह वह दौर था जब भारत के बड़े औद्योगिक घराने लगभग अजेय माने जाते थे राजनीति और पूँजी के रिश्तों पर खुलकर चर्चा भी नहीं होती थी लेकिन वीपी सिंह ने पहली बार उस व्यवस्था को चुनौती देने का साहस दिखाया उन्होंने कर चोरी और आर्थिक अनियमितताओं के विरुद्ध अभियान चलाया। उन्होंने यह स्थापित करने का प्रयास किया कि राष्ट्र केवल गरीबों से कर वसूलने के लिए नहीं बना है, बल्कि सबसे शक्तिशाली लोगों को भी जवाबदेह होना पड़ेगा।

फिर उन्हें रक्षा मंत्रालय भेज दिया जाता है।

लेकिन जो व्यक्ति सच के साथ खड़ा होने का निर्णय कर चुका हो, वह विभाग बदलने से नहीं बदलता।

रक्षा मंत्री के रूप में उन्होंने रक्षा सौदों की अपारदर्शिता पर प्रश्न उठाए। उन्होंने उन क्षेत्रों में भी जवाबदेही की माँग की जहाँ प्रश्न पूछना लगभग वर्जित माना जाता था। वह जानते थे कि यह रास्ता उन्हें सत्ता के केंद्र से दूर ले जाएगा, लेकिन उन्होंने रास्ता नहीं बदला।

फिर वह भारत के प्रधानमंत्री बनते हैं।

यहीं से उनकी कहानी भारतीय लोकतंत्र की कहानी बन जाती है।

भारत की विशाल आबादी का एक बड़ा हिस्सा सदियों से अवसरों के दरवाजों के बाहर खड़ा था। संविधान ने समानता का वादा किया था, लेकिन सामाजिक वास्तविकताएँ अभी भी असमान थीं। ऐसे समय में मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करना केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं था, बल्कि भारतीय सत्ता संरचना को पुनर्परिभाषित करने का प्रयास था।

कोई भी व्यक्ति यह निर्णय तब तक नहीं ले सकता जब तक वह सत्ता से अधिक किसी बड़े उद्देश्य में विश्वास न करता हो।

उन्हें पता था कि सरकार गिर सकती है।

उन्हें पता था कि विरोध होगा।

उन्हें पता था कि उनके विरुद्ध अभियान चलेंगे।

उन्हें यह भी पता था कि इतिहास तुरंत न्याय नहीं करता।

फिर भी उन्होंने निर्णय लिया।

राजनीति में ऐसे उदाहरण दुर्लभ हैं जहाँ किसी नेता ने जानबूझकर अपने राजनीतिक भविष्य को दाँव पर लगाकर करोड़ों लोगों के भविष्य को प्राथमिकता दी हो।

यही कारण है कि विश्वनाथ प्रताप सिंह को केवल एक प्रधानमंत्री के रूप में नहीं पढ़ा जाना चाहिए। उन्हें भारतीय लोकतंत्र के नैतिक चरित्र के रूप में पढ़ा जाना चाहिए।

विडंबना देखिए।

जिन नेताओं ने मंडल की राजनीति से अपना साम्राज्य खड़ा किया, वे आज भी चर्चा में हैं।

जिन दलों ने कभी उनका विरोध किया था, वे भी आज सामाजिक न्याय की भाषा बोलते हैं।

जिन वर्गों के लिए उन्होंने सबसे बड़ा राजनीतिक जोखिम उठाया, उनमें से भी अनेक उन्हें भूल चुके हैं।

और जिन वर्गों से वह स्वयं आते थे, उन्होंने भी उन्हें अपना नायक बनाने का गंभीर प्रयास नहीं किया।

मानो भारतीय राजनीति ने उनके योगदान का उपयोग तो किया, लेकिन उन्हें उनका उचित स्थान देने से परहेज़ किया।

यह केवल एक व्यक्ति की उपेक्षा नहीं है।

यह उस राजनीतिक परंपरा की उपेक्षा है जिसमें सिद्धांत सत्ता से बड़ा होता है।

आज जब #भारत_रत्न की चर्चाएँ होती हैं, तब यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या विश्वनाथ प्रताप सिंह का नाम उन व्यक्तित्वों में नहीं होना चाहिए जिन्होंने आधुनिक भारत की सामाजिक और राजनीतिक संरचना को निर्णायक रूप से प्रभावित किया?

भारत रत्न किसी व्यक्ति को महान नहीं बनाता।

लेकिन राष्ट्र जिन लोगों को अपना सर्वोच्च सम्मान देता है, वह उसके सामूहिक विवेक का परिचय होता है।

विश्वनाथ प्रताप सिंह को शायद इस सम्मान की आवश्यकता नहीं है। उनका वास्तविक सम्मान उन करोड़ों लोगों के जीवन में दर्ज है जिनके लिए अवसरों के कुछ दरवाजे खुले उनका सम्मान उस राजनीतिक साहस में दर्ज है जिसने भ्रष्टाचार, पूँजी और सत्ता के गठजोड़ को चुनौती दी उनका सम्मान उस नैतिक शक्ति में दर्ज है जिसने बार-बार उन्हें अपने हितों के विरुद्ध खड़ा किया।

फिर भी इतिहास के प्रति न्याय की माँग है कि इस व्यक्तित्व को पुनः पढ़ा जाए, पुनः समझा जाए और उसका उचित मूल्यांकन किया जाए।

क्योंकि भारतीय राजनीति में राजा बहुत हुए, प्रधानमंत्री भी बहुत हुए, सामाजिक न्याय की बातें करने वाले भी बहुत हुए।

लेकिन राजा होकर जमीन बाँट देने वाले, मंत्री होकर उद्योगपतियों को चुनौती देने वाले और प्रधानमंत्री बनकर सत्ता के बंद दरवाजे करोड़ों वंचितों के लिए खोल देने वाले व्यक्तित्व बहुत कम हुए हैं और विश्वनाथ प्रताप सिंह उन्हीं दुर्लभ व्यक्तित्वों में से एक थे और शायद इसीलिए उन पर अभी बहुत कुछ लिखा जाना बोला जाना और पढ़ा जाना बाकी है।

✍️अभिषेक कुमार सिंह गहरवार

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