देश में अपने कई बार यह सुना होगा कि खूंखार आतंकवादी या जघन्य हत्याकांड का हत्यारा या बलात्कारी के मामले में बुलडोजर की कार्यवाही एक प्रथा बन गई थी पर यदि ऐसी स्थिति ना हो और फिर भी बुलडोजर की कार्यवाही नियम विरुद्ध तरीके से कर दी जाए तो फिर सवाल तो बनता है कि आखिर ऐसी कौन सी परिस्थिति आ गई थी या कौन सा कानून व्यवस्था खराब हो रहा था कि किसी अखबार के दफ्तर व प्रतिष्ठान पर बुलडोजर की कार्यवाही करने की जल्दबाजी की गई बिना अपील का मौका दिए कार्यवाही करने के लिए आप विवश थे क्या अखबार के संपादक, पत्रकार आतंकवादी थे हत्यारे थे या बलात्कारी थे या फिर किसी आतंकवादी को अपने कार्यालय में पनाह दे रखी थी कि प्रशासन के लिए बिना समय दिए आशियाने को उजाडऩा अत्यंत जरूरी था ऐसी कौन सी मजबूरी थी या ऐसी कौन सी कानून व्यवस्था खराब हो रही थी कि कलेक्टर सरगुजा के लिए आनन-फानन कार्यवाही करानी पड़ी? आज वही कार्यवाही नासूर बन गई है और चीख-चीख कर हर दिन अखबार फिर भी सवाल पूछ रहा है कि अब तो आप ही पूछकर बता दीजिए कि क्या छापे सरगुजा कलेक्टर और आपने अपील के अधिकार से वंचित क्यों रखा आखिर ईमानदार छवि वाले तानाशाह कैसे बन गए










