लोकसभा चुनाव: पिछले चुनाव से दिलचस्प रहा इस बार इत्रनगरी का सियासी दंगल, अपनी जीत को तय मान रहा भाजपा का खेमा

UP Lok Sabha Phase 4 Election: भाजपा का खेमा अपनी जीत को तय मान रहा है जबकि सपा के लोग फिर से गढ़ पर काबिज होने की बात कर रहे हैं।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि इस बार का लोकसभा चुनाव पिछले कई चुनावों से हटकर रहा। पहले भी अखिलेश यादव यहां से तीन बार चुनाव लड़े हैं। तब भी उनका मुकाबला दिग्गजों से रहा है। इस भी उनका मुकाबला भाजपा के उस उम्मीदवार से हुआ, जिसने पिछले चुनाव में उनकी पत्नी को हराकर उनसे उनका यह गढ़ फतह कर लिया था। दोनों ओर से कन्नौज संसदीय सीट पर कामयाबी के लिए खूद दांव-पेंच चले गए।

अब कौन किस पर कितना भारी पड़ा है, यह तो अगले महीने चार जून को ही पता चलेगा। इस चुनाव ने सपा और भाजपा दोनों को आसमान से उतार कर जमीन पर मेहनत करने को मजबूर कर दिया। पहले कन्नौज का सांसद और बाद में सूबे का मुख्यमंत्री रहते हुए यहां के लिए कराए गए काम का हवाला देकर मैदान में उतरे अखिलेश यादव के लिए भी यह चुनाव आसान नहीं रहा। नामांकन के आखिरी दिन से ठीक पहले तक सस्पेंस के बीच आखिरकार उनके नाम का ऐलान किया गया था। उसके पहले हालांकि वह कई बार यहां से लड़ने का इशारा दे चुके थे, लेकिन बाद में खुद मैदान में आने से बचने की रणनीति तैयार की थी।

जब उन्होंने यहां से अपने भतीजे तेज प्रताप यादव को उम्मीदवार बनाया तो माहौल बदल गया। खुद सपा के लोग ही इस फैसले पर हैरानी जताने लगे। भाजपा ने इसे सपा का डर बताकर हमला बोलना शुरू कर दिया। आखिरकार दो दिन में ही सपा को अपना फैसला बदलना पड़ा। चुनाव के दौरान भी अखिलेश यादव को यहां कई बार आना पड़ा। नामांकन के अगले ही दिन वह रसूलाबाद से चुनावी रथ में सवार होकर निकले। अपने रोडशो से उन्होंने अपनी ताकत दिखाते हुए भाजपा को चुनौती दी। उसके बाद भी अलग-अलग समय पर कहीं सभा तो कहीं जनसंपर्क के बहाने वह यहां सक्रिय रहे।

खुद सपा से ही जुड़े लोग बताते हैं कि पहले चुनाव के अलावा उसके बाद के चुनाव में उन्हें इस तरह मेहनत नहीं करनी पड़ी थी। खुद अखिलेश यादव को भी पता है कि इस बार चूकने का मतलब लंबे समय तक पार्टी को उबरने में समय लगेगा। इसके बावजूद उन्होंने यहां ताल ठोका। दूसरी तरफ देश और प्रदेश की सत्ता पर काबिज भाजपा अपनी जनकल्याणकारी योजनाओं के साथ ही राम मंदिर और प्रधानमंत्री के चेहरे को आगे कर के मैदान में उतरी थी। सपा से मिल रही चुनौती को ध्यान में रखते ही भाजपा ने उसी तरह अपनी रणनीति भी तैयार की थी। खुद सांसद सुब्रत पाठक अखिलेश यादव पर हमलावर होने के साथ ही खुद को मोदी का परिवार और 400 पार के नारे के साथ ही राम मंदिर निर्माण को सामने रखते रहे। दोनों में से किसका पैतरा कामयाब बनाता है, इस पर सभी की निगाह लगी हुई है।

अखिलेश को पहले चुनाव में मिली थी बसपा से कड़ी टक्कर

वर्ष 2000 में हुए उपचुनाव के दौरान पहली बार मैदान में उतरे अखिलेश यादव के सामने बसपा ने पूर्वांचल के दिग्गज चेहरा अकबर अहमद डंपी को मैदान में उतार कर राह मुश्किल कर दी थी। उस चुनाव में खुद मुलायम सिंह यादव ने मैदान में उतकर अपने धोबी पछाड़ दांव से बसपा उम्मीदवार को चित्त करते हुए अखिलेश यादव को पहली जीत दिलवाई थी। इस बार मामला अलग है। अखिलेश यादव खुद ही पार्टी के मुखिया हैं। ऐसे में उनके सामने खुद के साथ ही पार्टी का बेड़ा पार लगाने की भी दोहरी चुनौती रही है। इससे उबरने में वह कितना कामयाब हुए हैं, यह नतीजों से पता चलेगा।

अखिलेश-सुब्रत का चौथा चुनाव, दूसरी बार आमने-सामने की टक्कर

एक और दिलचस्प संयोग देखिए। सपा से लड़ रहे अखिलेश यादव और भाजपा से लड़ रहे सुब्रत पाठक, दोनों का इस सीट से यह चौथा चुनाव है। अखिलेश यादव पहले भी यहां से तीन चुनाव लड़कर तीनों बार जीत हासिल कर चुके हैं। इस सीट से यह उनका चौथा चुनाव है। इसके ठीक पहले के 2019 के चुनाव में वह आजमगढ़ सीट से जीते थे। उनके सामने इस सीट से मौजूदा सांसद सुब्रत पाठक का भी यह चौथा चुनाव है। 2009 में अपने पहले चुनाव में वह अखिलेश यादव के सामने उतरे थे। तब अखिलेश यादव उस चुनाव को जीत कर इस सीट से लगातार तीन जीत के साथ हैट्रिक लगाने वाले पहले सांसद बने थे। सुब्रत पाठक को तीसरा स्थान मिला था। 2014 के अपने दूसरे चुनाव में सुब्रत पाठक का मुकाबला अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव से हुआ था। तब सुब्रत पाठक नाकाम रहे थे। अगले ही चुनाव 2019 के मुकाबले में सुब्रत पाठक तीसरी कोशिश में पहली बार कामयाब हुए थे। इस बार वह चौथी बार मैदान में हैं। इस बार उनसे मुकाबले के लिए खुद अखिलेश यादव सामने हैं

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