इंडिया मोमेंट को अब इंडिया मूवमेंट कहें’, India Today Conclave में बोले अरुण पुरी

India Today Conclave 2024: इंडिया टुडे कॉन्क्लेव का आगाज हो गया है. कॉन्क्लेव का आयोजन राजधानी दिल्ली में 15 मार्च से शुरू हुआ और यह 16 मार्च तक चलेगा. कॉन्क्लेव के प्रतिष्ठित वक्ताओं में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह, विदेश मंत्री एस जयशंकर वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण, नारायण मूर्ति समेत कई दिग्गज हस्तियां हैं.

India Today Conclave 2024 का आगाज हो गया है. दो दिनों तक चलने वाले इस आयोजन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह समेत कई अन्य वरिष्ठ नेता और हस्तियां शिरकत कर रही हैं. आयोजन के स्वागत भाषण में इंडिया टुडे समूह के चेयरमैन एवं एडिटर-इन-चीफ अरुण पुरी ने कहा कि ‘इंडिया मोमेंट’ का लगातार विस्तार हुआ है और इसका दायरा लगातार बढ़ा है. नीचे पढ़ें अरुण पुरी

का पूरा भाषणः-

 

सम्मानित अतिथियों

सुप्रभात  इंडिया टुडे कॉन्क्लेव के 21वें संस्करण में स्वागत है. पिछले साल हमारे कॉन्क्लेव की थीम थी ‘इंडिया मोमेंट’. मैं पूरे विश्वास के साथ कह  सकता हूं कि ‘इंडिया मोमेंट’ का लगातार विस्तार हुआ है और इसका दायरा लगातार बढ़ा है. लेकिन थोड़ा महत्वाकांक्षी होकर इसे ‘इंडिया मूवमेंट’ कहें. इस तरह हम खुद को याद दिलाते रहेंगे कि हमें अभी क्या-क्या करना है? इस तरह हम खुद से लगातार पूछते रहेंगे कि हमारा अगला बड़ा कदम क्या है?

हम आज क्या कर सकते हैं ताकि ये सुनिश्चित हो सके कि इंडिया मोमेंट लंबे समय तक रहे और एक आंदोलन में तब्दील हो जाए. और यह भारत को इतना विकसित और सशक्त कर दे, जैसा पहले कोई और ना हुआ हो.

मेरे लिए, एक बेहतर भविष्य का निर्माण करने का तरीका उस भविष्य को लेकर स्पष्ट विजन रखना है. और फिर उस विजन को वास्तविकता में तब्दील करने की दिशा में काम करने से है.
आज, मैं आपके सामने भारत के भविष्य की पांच तस्वीरें पेश करने जा रहा हूं, जो मुझे लगता है कि हमने हासिल कर ली हैं. पहली, गरीबी रेखा  (Poverty Line) को भूल जाइए, जिसे लेकर भारत में आमतौर पर चर्चा होती है. अब इसे गरिमा रेखा (Dignity Line) में तब्दील कर दें. मैं इसे गरिमा रेखा ही कहूंगा. पिछले लगभग एक महीने के भीतर सरकार ने जो डेटा जारी किया है, उसमें बताया था कि देश में अत्यधिक गरीबी  लगभग खत्म हो गई है. अत्यधिक गरीबी अब देश में दो फीसदी से भी कम है.

लेकिन मैं आपको बताना चाहूंगा कि अत्यधिक गरीबी को पार करना बहुत आसान है. वर्ल्ड बैंक के मुताबिक, गरीबी को प्रतिदिन 2.15 डॉलर पीपीपी की उपभोग खपत के रूप में परिभाषित किया गया है. इसका मतलब है कि यह एक महीने में 1200 रुपये से 1500 रुपये या प्रतिदिन  के हिसाब से 40 से 50 रुपये है.

बीते दस सालों में मौजूदा सरकार ने 20 करोड़ से ज्यादा लोगों को अत्यधिक गरीबी रेखा से ऊपर उठाकर बेहतरीन काम किया है.अब गरिमा रेखा को निर्धारित करते हैं. यह वह रेखा है, जो बुनियादी तौर पर गरिमापूर्ण जीवन जीने का पैमाना तय करती है. इसमें भोजन से  लेकर आवास, बिजली, स्वच्छ पानी, शिक्षा और हेल्थकेयर जैसी बुनियादी सुविधाएं शामिल हैं. और यकीनन, एक रोजगार जिससे आपको बेसिक आय हो.

मुझे लगता है कि प्रधानमंत्री मोदी ने जब दस साल पहले पदभार संभाला था, तो उन्होंने समाज के सबसे निचले वर्ग के लोगों को गरिमापूर्ण जीवन मुहैया कराने के विचार को समझ लिया था.

इस वजह से उनका जोर स्वच्छ भारत, हर घर नल से जल और बिजली जैसी योजनाओं पर रहा. इसके साथ ही नीति आयोग गरीबी को गरीबी रेखा से नहीं मापता बल्कि वे इसे बहुआयामी गरीबी (मल्टी डाइमेंशनल पॉवर्टी) कहते हैं. यह स्वागत योग्य कदम है

मौजूदा अनुमान के मुताबिक 11.3 फीसदी भारतीय बहुआयामी गरीबी रेखा से नीचे हैं. हमें यह लक्ष्य रखना चाहिए कि इस गरीबी रेखा से नीचे  या तो लोग नहीं हों या फिर दो फीसदी से अधिक भारतीय ना हों. इस तरह हर भारतीय के पास उपलब्ध अवसरों से लाभ उठाने का उचित मौका होगा.

दूसरा मुद्दा शिक्षा है. कोई भी देश अच्छी शिक्षा प्रणाली के बगैर विकसित नहीं हुआ है. शिक्षा में हमने दाखिला लेने की समस्या सुलझाई है.  लेकिन दाखिला लेने और ग्रैजुएशन के बीच जो होता है या नहीं होता है, उस पर ध्यान नहीं दिया गया है. इससे एक तरफ सिखाने और सीखने के बीच के बड़े अंतर का पता चलता है जबकि दूसरी तरफ युवाओं में भारी बेरोजगारी का पता चलता है.

हाल ही में हुए एक सर्वे से पता चला है कि 14 से 18 साल के 25 फीसदी लोग अपनी क्षेत्रीय भाषा में दूसरी कक्षा की किताब नहीं पढ़ सकते.  इनमें से 50 फीसदी से भी कम दूसरी कक्षा के गणित का सवाल हल नहीं कर सके. यह दुखद स्थिति है इस देश के भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं है.

पाठ्यक्रम से लेकर शिक्षाशास्त्र और शिक्षण तक शिक्षा की गुणवत्ता दाखिले के अनुरूप नहीं है. यह शिक्षा के सभी स्तरों प्राथमिक, सेकेंडरी और कॉलेज तक है. कॉलेज स्तर पर शिक्षा ऐसी होनी चाहिए, जिससे रोजगार मिल सके.

हाल में जारी हुए डेटा से पता चलता है कि युवाओं में बेरोजगारी 16.5 फीसदी है. आज से पांच साल बाद हमें युवाओं में बेरोजगारी को कर पांच फीसदी से अधिक नहीं होने देने का लक्ष्य रखना होगा.

इसे जल्दी से बदलने की जरूरत है. अगर हम इसे गंभीरता से लेंगे तो AI इसमें मदद कर सकता है. कुछ महीनों में, हमारे बच्चों की पहुंच ऐसी  उच्च गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक हो सकती है, जो उनकी समझ के अनुकूल हो. उनकी स्थानीय भाषा में निशुल्क रूप से घरों तक शिक्षा पहुंच सके.

 

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