
भारत के पड़ोसी मुल्कों पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बारे में माना जाता रहा कि ये आतंक के गढ़ हैं. पाकिस्तान में 150 से ज्यादा आतंकी गुट फल-फूल रहे हैं,
जबकि बहुत से दहशतगर्दों ने पनाह लेते आए. लेकिन दुनिया का एक और हिस्सा है, जो चुपके से टैरर का एपिसेंटर बनता जा रहा है. साल 2022 में आतंकवाद के चलते हुई 43 फीसदी मौतें,
इन दिनों कई देश आपस में लड़-भिड़ रहे हैं. ताजा मामला ईरान और पाकिस्तान का है, जो एक-दूसरे पर एयरस्ट्राइक कर रहे हैं. इसकी बड़ी वजह उनके चरमपंथी गुट है दोनों ही देश दावा कर रहे हैं कि उन्होंने आम जनता नहीं, बल्कि आतंकियों के ठिकानों पर हमला किया. इस उथलपुथल का तो सबको अंदाजा है, लेकिन दुनिया की नाक के नीचे एक और हिस्सा टैरर का सबसे बड़ा गढ़ बन चुका है,
अफ्रीका का ये भाग चपेट में
ये सहेल पट्टी है, यानी 10 अफ्रीकी देशों का समूह. यूनाइटेड नेशन्स इंटीग्रेटेड स्ट्रेटजी फॉर द सहेल के अनुसार अफ्रीकी पट्टी में सेनेगल, गाम्बिया, मॉरिटानिया, गिनी, माली, बुर्किना फासो, नाइजर, चड, कैमरून और नाइजीरिया शामिल हैं. वैसे सहेल 12 देशों से मिलकर बना है, लेकिन भौगोल स्थिति के आधार पर संस्थाएं इसे कम-ज्यादा करती हैं. अटलांटिक महासागर से लेकर लाल सागर तक फैला ये एरिया बीते कुछ सालों में बहुत तेजी से आतंकियों को अपनी ओर खींचने लगा,
तीन सालों के भीतर बढ़ा आतंकवाद
ग्लोबल टैररिज्म इंडेक्स का डेटा यह साफ कर देता है. साल 2007 में इन देशों में आतंक की वजह से 7 प्रतिशत मौतें हुईं, जबकि जबकि अगले 15 ही सालों के भीतर ये बढ़कर 43 प्रतिशत हो गई. खासकर बुर्किना फासो, नाइजर और माली में सबसे ज्यादा चरमपंथी संगठन तैयार हो रहे हैं. इसकी एक वजह है सिविल वॉर
सहेल के वेस्टर्न हिस्से में लगातार कोई न कोई अंदरुनी लड़ाई चलती रही. यहां मोटे तौर पर तीन एथनिक समूह हैं, बर्बर, होसा और योरुबा. इसमें भी कई सब-डिवीजन हैं. खानपान और पूजा-पाठ से लेकर बोली के आधार पर लोग खुद को अलग मानते हैं. तो होता ये है कि अक्सर सत्ता में बदलाव के दौरान लोकल समूह एक-दूसरे से लड़ने लगते हैं.
सभी चाहते हैं कि उनके लोगों के पास ज्यादा ताकत आए. बड़े स्तर पर इसे धार्मिक रंग भी दिया जाता है, जैसे जैसे मुस्लिमों में शिया-सुन्नी के बीच का भेद. चूंकि अफ्रीका में युवा आबादी बहुत ज्यादा है, लिहाजा लड़ाइयां भी वहां खुलकर होती हैं.
लंबाई और हालात भी बाधा
ये 4 हजार किलोमीटर से ज्यादा इलाके में फैला हुआ है. भौगोलिक तौर पर काफी दुर्गम है, जहां जाना आसान नहीं. ये चीज पेट्रोलिंग में रुकावट डालती है इसलिए इंटरनेशनल पीस एजेंसियां भी यहां खास काम नहीं कर पातीं.










