न्यू इंडिया में अवैध बच्चों का गुजरात मॉडल
क्या आप जानते हैं कि गुजरात में अधिकतर पिता पितृत्व की जांच हेतु किये गये डीएनए परीक्षण में अपने बच्चे के जैविक पिता सिद्ध नहीं होते?
यह रहस्योद्घाटन गुजरात के न्यायालयों में दायर पितृत्व मामलों में से 98% मामलों की फॉरेंसिक जांच में पिता बच्चे का जैविक पिता नहीं पाये जाने से हुआ।
टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी एक रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2014 में जांच एजेंसियों और न्यायपालिका के अनुसार, गुजरात में सालाना 250 से अधिक पितृत्व परीक्षण के मामले दर्ज किए जाते हैं। जिनके डेटा से पता चला कि 98% मामले संदेहास्पद हैं जो इसकी पुष्टि करते हैं कि बच्चे की मां के अपने पति के अतिरिक्त किसी अन्य व्यक्ति से शारीरिक सम्बंध थे।
फॉरेंसिक साइंसेज निदेशालय (डीएफएस), गांधीनगर का डीएनए प्रभाग उन परीक्षणों के लिए नोडल एजेंसी के रूप में काम करता है जो पुलिस और अदालतों के माध्यम से सख्ती से कराए जाते हैं। डीएफएस ने कई निजी परीक्षण अनुरोधों को अस्वीकार कर दिया, जो अंततः निजी प्रयोगशालाओं में पहुंच गए।
डीएफएस का डीएनए डिवीजन जीनोटाइपिंग और वाई-क्रोमोसोम डीएनए प्रोफाइल करता है, जिसके माध्यम से कोई यह निर्धारित कर सकता है कि नमूना माता-पिता से कितना मेल खाता है।
अब समझ आया कि हिंदू सांस्कृतिक पुनर्जागरण के झंडाबरदारों द्वारा क्यों आइपीसी की धारा 377 हटाई गई और क्यों लिव-इन-रिलेशनशिप तथा विवाहित जोड़े द्वारा दूसरे व्यक्ति से शारीरिक सम्बंध बनाने को वैधता प्रदान की गई!











