किसान आंदोलन के चलते सुरक्षा व्यवस्था पंजाब और हरियाणा के कई जिलों में 23 फरवरी तक ‘इंटरनेट शटडाउन’ किया गया है। एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 2024 में अब तक 17 बार इंटरनेट बंद किया जा चुका है। यही नहीं रिपोर्ट में कहा गया है कि 2012 के बाद से अब तक कुल 805 बार भारत में अलग-अलग जगहों पर इंटरनेट बंद करने की घटनाएं हुई हैं।
आंकड़ों के मुताबिक सर्वाधिक 433 बार जम्मू-कश्मीर में, इसके बाद 100 बार राजस्थान और फिर 45 बार मणिपुर में इंटरनेट बंदी हुई है। हरियाणा में 37 और उत्तर प्रदेश में 33 बार इंटरनेट बंद किया गया है जबकि बिहार में कुल 21 बार इंटरनेट बंद हुआ है।
केरल में एक बार भी नहीं आई नौबत
दक्षिण भारतीय राज्य केरल में कभी इंटरनेट बंद नहीं किया गया है जबकि तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में एक-एक बार इंटरनेट बंद हुआ। जबकि मणिपुर में 200 दिनों तक इंटरनेट बंद रहा है। साल 2012 में सिर्फ 3 बार इंटरनेट पर रोक लगी थी, 2013 में 5 बार, 2014 में 6 बार और 2015 में 14 बार इंटरनेट बंद किया गया। इंटरनेट बंद करने की सबसे ज्यादा घटनाएं 2018 में 136 हुईं। इसके अलावा 2020 में 132 बार और 2019 में 109 बार इंटरनेट बंद करने की घटनाएं सामने आई थीं।
2022 में इंटरनेट बंद करने की 84 घटनाएं
दुनियाभर में इंटरनेट पर प्रतिबंधों पर नजर रखने वाली संस्था एक्सेस नाऊ के हवाले से मीडिया रिपोर्ट में कहा गया है कि साल 2022 में भारत में इंटरनेट बंद करने की 84 घटनाएं हुईं। एक्सेस नाउ के मुताबिक इस दौरान दुनिया के 35 देशों में सरकारों ने कुल 187 बार इंटरनेट बंद किया।
सर्वाधिक बार भारत में इंटरनेट बंद किया गया। 28 फरवरी 2023 को जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक 2016 के बाद से दुनियाभर में इंटरनेट बंद करने की 58 प्रतिशत घटनाएं भारत में हुई हैं। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रदर्शन, संघर्ष, स्कूल परीक्षाओं और चुनावों जैसी घटनाओं के दौरान भारत में सर्वाधिक इंटरनेट बंद किया गया है।
कोर्ट ने दिए हैं इंटरनेट शटडाउन की समीक्षा के आदेश
इसे सेंसरशिप में अप्रत्याशित बढ़ोतरी कहा गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में सरकार ने इंटरनेट पर रोक का सामान्यीकरण किया है और केंद्रीय सरकार ने पारदर्शिता और जिम्मेदारी तय करने का कोई रास्ता नहीं निकाला है।
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2020 में अनुराधा भसीन बनाम भारत सरकार मामले में कहा था सीआरपीसी 144 के तहत दी गई शक्तियों का इस्तेमाल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता या किसी लोकतांत्रिक अधिकार के हनन के लिए नहीं किया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से इंटरनेट पर रोक के सभी आदेशों की फिर से समीक्षा करने के लिए भी कहा था। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में ये भी कहा था कि जो आदेश क़ानून के तहत नहीं है उन्हें तुरंत निष्प्रभावी किया जाए।
किस आधार पर किया जाता है इंटरनेट बंद
वहीं संचार और सूचना प्रौद्योगिकी पर संसद की स्टैंडिंग समिति के समक्ष भारत के गृह मंत्रालय और संचार विभाग ने कहा था कि सार्वजनिक आपातकाल और जनता की सुरक्षा’ ऐसे दो आधार है जिन पर इंटरनेट बंद करने का आदेश दिया जा सकता है। समिति ने सरकार से पूछा था कि पब्लिक इमरजेंसी और पब्लिक सेफ्टी के अलावा किन और कारणों से इंटरनेट कब-कब बंद किया गया।
इसके जवाब में सरकार ने कहा था कि इंटरनेट शटडाउन को लेकर सरकार रिकॉर्ड नहीं रखती है। भारतीय टेलीग्राफ एक्ट 1885 की धारा 5(2) के तहत पब्लिक सेफ्टी और पब्लिक इमरजेंसी को लेकर पैमाने परिभाषित हैं। हालांकि गृह मंत्रालय ने इनकी परिभाषा के बारे में पूछे गए सवाल पर समिति में कहा था, ये शब्द टेलीग्राफ एक्ट में हैं जिसे संचार विभाग देखता है। इसलिए क़ानून की परिभाषा में उन्हें देखना होगा कि इसकी व्याख्या है या नहीं।










