पैनिक अटैक आता था तो उसका होंठ खिंचकर एक तरफ चला जाता था। मुंह से आवाज नहीं निकलती थी। उसी आदमी के नाम आईपीएल के इतिहास में सबसे ज्यादा विकेट हैं।
और बचपन में मां-बाप ने उसे शतरंज इसलिए थमाई थी, ताकि वो बुरी संगत से बचा रहे।
आज उसने एक पॉडकास्ट पर बैठकर वो बात कह दी, जो हमारे यहां मर्द अपने सबसे करीबी दोस्त से भी नहीं कहते।
कि शराब हद से आगे निकल गई थी। कि उसे रिहैब जाना पड़ा। और वो छब्बीस दिन वहां रहा।
छत्तीस साल का है। तीन साल से टीम इंडिया की जर्सी नहीं पहनी। पंद्रह दिन पहले लाल गेंद की क्रिकेट को अलविदा कहा है।
नाम, युजवेंद्र चहल।
पूरा देश उसे युजी कहता है। सोशल मीडिया पर उसकी शरारतें देखकर लोग हंसते हैं। मैदान पर वो सबसे दुबला-पतला खिलाड़ी दिखता है, और सबसे ज्यादा मुस्कुराता हुआ भी।
पर इस मुस्कान के पीछे क्या चल रहा था, ये उसने आज खुलकर बताया है।
पूर्व क्रिकेटर आकाश चोपड़ा के पॉडकास्ट पर। और जो कहा, वो मैंने पहले अंग्रेजी रिपोर्टों में पढ़ा, फिर हिंदी में। दो बार पढ़ने के बाद भी एक लाइन दिमाग से नहीं निकली। उस पर आगे आता हूं।
हफ्ते में एक दिन मैं अपने अखबार का खेल पन्ना भी देखता हूं। खेल की खबरों में स्कोर होता है, विकेट होते हैं, नीलामी की रकम होती है। आदमी नहीं होता। आज की खबर में पहली बार स्कोर से बड़ा आदमी था।

अब शुरू से शुरू करते हैं।
हरियाणा। जींद।
एक लड़का, जिसके हाथ में बल्ला या गेंद नहीं, शतरंज के मोहरे थे।
पिता केके चहल ने बेटे को शतरंज इसलिए सिखाई थी कि लड़का बाहर आवारा न घूमे, गलत संगत में न पड़े। ये बात शतरंज की खबरें छापने वाली वेबसाइट चेसबेस इंडिया ने दर्ज की है।
और लड़का खेल में डूब गया।
कोई बड़ा कोच नहीं था। ज्यादातर कंप्यूटर के साथ खेलकर खुद सीखा।
2002।
कोलकाता। मेरा शहर।
यहीं उस लड़के ने अंडर-बारह की नेशनल चैंपियनशिप जीती। फिर एशियाई और विश्व जूनियर चैंपियनशिप में भारत की तरफ से खेला।
फिर पैसा आड़े आया।
शतरंज की तैयारी में साल का करीब पांच लाख रुपये खर्च होता था। स्पॉन्सर नहीं मिला। पिता ने बाद में एक इंटरव्यू में सीधे कहा था कि हमें स्पॉन्सर नहीं मिले। और ये भी कहा कि उन्होंने बेटे को आजादी दी थी, शतरंज चुने या क्रिकेट।
बेटे ने क्रिकेट चुना।
जींद के नेहरू स्टेडियम में प्रैक्टिस शुरू हुई। और फिर पिता ने वो किया, जो इस कहानी का सबसे चुपचाप सा दृश्य है। परिवार की दो एकड़ खेती की जमीन पर बेटे के लिए अभ्यास का मैदान बनवा दिया।
जिस जमीन पर फसल उगनी थी, वहां एक पिच उगी।
शतरंज छूटा, पर गया नहीं। चहल ने खुद कहा है कि शतरंज उन्हें बल्लेबाज का विकेट प्लान करने में मदद करता है, और दिमाग ठंडा रखता है। एक लेग स्पिनर, जो हर गेंद से पहले तीन चाल आगे सोचता है।
2009 में हरियाणा के लिए फर्स्ट क्लास डेब्यू।
2011 में पहला आईपीएल।
और यहीं से उस बात की शुरुआत होती है, जो आज पंद्रह साल बाद उसने कबूल की।
आकाश चोपड़ा ने पूछा, शराब कब और कैसे शुरू हुई।
चहल ने जवाब दिया, शुरुआत में मैं जवान था, पार्टियां होती थीं।
बस इतना। कोई सफाई नहीं। कोई बहाना नहीं।
उन्होंने एक और बात बताई। दक्षिण अफ्रीका के महान बल्लेबाज एबी डिविलियर्स ने उनसे एक बार कहा था कि जिंदगी में संतुलन सबसे जरूरी है। चहल बोले, ये बात सुनने में आसान लगती है। अपनाना आसान नहीं होता।
मैंने ये लाइन पढ़कर सोचा, हममें से कितने लोग हैं जिन्हें सही सलाह किसी ने दी ही नहीं? ज्यादातर को मिली थी। मानना ही नहीं हुआ।
फिर सालों तक वो चढ़ता गया।
भारत के लिए बहत्तर वनडे। अस्सी टी-ट्वेंटी। आईपीएल में इतने विकेट कि आज भी उस लिस्ट में सबसे ऊपर उसी का नाम है।
पर एक सपना अधूरा रहा।
टेस्ट कैप।
भारत की सफेद जर्सी उसे कभी नहीं मिली। उसने खुद लिखा है कि टेस्ट कैप बरसों तक उसका सपना रहा, जिसे वो अपने साथ ढोता रहा।
अगस्त 2023। वेस्ट इंडीज के खिलाफ टी-ट्वेंटी सीरीज। आखिरी बार भारत के लिए मैदान पर उतरा।
उसके बाद बुलावा नहीं आया।
और फिर आया 2025।
उस साल उसकी निजी जिंदगी में तलाक हुआ। मैं उस रिश्ते के भीतर नहीं जाऊंगा। दो लोगों के बीच क्या हुआ, वो उनका है, किसी पोस्ट का नहीं। मैं वहीं तक रहूंगा, जहां तक चहल ने खुद अपनी बात कही है।
और उन्होंने कहा, तलाक के बाद चीजें हद से ज्यादा बढ़ गईं, मेरी मानसिक हालत ठीक नहीं थी।
यहीं से एंग्जायटी आई। यानी बेचैनी, घबराहट। और उसके साथ पैनिक अटैक।
अब वो लाइन, जो मेरे दिमाग से नहीं निकली।
उन्होंने बताया कि एंग्जायटी में दिल की धड़कन अंदर से बहुत तेज भागने लगती है। चेहरा सिकुड़ जाता है। मैं बोल भी नहीं पाता था, मेरा होंठ कसकर एक तरफ खिंच जाता था।
जिस आदमी की पहचान ही उसकी बातें हैं, जिसके वीडियो देखकर लोग हंसते हैं, वो बोलना चाहता है, और होंठ उसका साथ नहीं देता।
और फिर दूसरा डर।
लोग देख लेंगे। समझ जाएंगे कि कुछ गड़बड़ है। उन्होंने कहा कि जब आप पब्लिक फिगर होते हैं, तो आप सबको अपनी निजी जिंदगी पर कमेंट करने का न्योता दे देते हैं।
तो उन्होंने क्या किया?
छुपा लिया। सोचा, आईपीएल पर ध्यान देते हैं।
और अब वो बात, जो मुझे इस पूरी कहानी में सबसे अजीब लगी।
नवंबर 2024 की नीलामी में पंजाब किंग्स ने उन्हें अठारह करोड़ रुपये में खरीदा था। चहल कहते हैं, उन्होंने मुझ पर इतने पैसे के साथ भरोसा किया, मैं उन्हें निराश नहीं कर सकता।
अप्रैल 2025। मुल्लांपुर। पंजाब बनाम कोलकाता नाइट राइडर्स।
पंजाब ने सिर्फ एक सौ ग्यारह रन बनाए। टी-ट्वेंटी में इतना छोटा स्कोर बचाने की कोई सोचता भी नहीं।
चहल बोले, एक सौ ग्यारह बचाते हुए मुझे लगा कि अब मुझे आगे आना होगा।
चार ओवर। अट्ठाईस रन। चार विकेट।
कोलकाता पंचानबे रन पर रुक गई। पंजाब सोलह रन से जीता, और आईपीएल के इतिहास का सबसे छोटा स्कोर बचाने का रिकॉर्ड उसी शाम बना।
उस शाम पूरा देश चहल की जादुई गेंदबाजी देख रहा था।
किसी को नहीं पता था कि उसी साल वो आदमी अंदर ही अंदर किस चीज से लड़ रहा है।
यही बात मुझे सबसे ज्यादा चुभती है। मैदान पर रिकॉर्ड बन रहा था, और मैदान के बाहर एक आदमी टूट रहा था। और दोनों बातें एक साथ सच थीं।
उस साल उन्होंने एक फैसला और लिया, जो आसान नहीं था। सफेद गेंद के सिर्फ दो मैच खेले, और टी-ट्वेंटी से दूर रहे। उन्होंने कहा, मैं सौ फीसदी नहीं था, और मैं नहीं चाहता था कि मेरी वजह से टीम को नुकसान हो। उन्होंने ब्रेक मांगा। और ब्रेक मिल गया।
फिर इंग्लैंड। काउंटी क्रिकेट।
और काउंटी का वो सीजन खत्म होने के बाद, उन्होंने खुद से वो सवाल पूछा, जो इस पूरी कहानी की जड़ है।
उनके अपने शब्द हैं, मुझे एहसास हुआ कि अगर मैं इसी रास्ते पर चलता रहा, तो जिस चीज से मुझे सबसे ज्यादा प्यार है, उसी को बर्बाद कर दूंगा। क्रिकेट को।
तो उन्होंने शराब छोड़ने का फैसला किया।
ज्यादा हो गया था। लिमिट क्रॉस कर दी थी। ये भी उन्हीं के शब्द हैं, हिंदी में।
रिहैब सेंटर। छब्बीस दिन।
यहां एक बात डॉक्टरी की, जो रिसर्च वाले बरसों से कह रहे हैं।
शराब और घबराहट का रिश्ता दोनों तरफ से चलता है। बेचैनी हो, तो आदमी कई बार उसे दबाने के लिए पीता है। और ज्यादा पीना, आगे चलकर बेचैनी को और बढ़ाता है। मेडिकल न्यूज टुडे में छपी समीक्षा कई अध्ययनों के हवाले से बताती है कि शराब की लत का इलाज करा रहे लोगों में करीब आधे तक किसी न किसी एंग्जायटी डिसऑर्डर से भी जूझ रहे होते हैं। और शराब कम करने से कई लोगों में घबराहट और उदासी, दोनों में सुधार देखा गया है।
यानी जो चीज राहत लगती है, वही धीरे-धीरे जंजीर बन जाती है।
चहल ने उस जंजीर को अपने हाथ से खोला। और खोलने का पहला कदम था, ये मान लेना कि जंजीर है।
अब वो जो बाहर निकला।
उन्होंने कहा, अब मुझे पता है कि इसे कैसे संभालना है। मेरी समझ बढ़ी है। मेरी भावनाएं अब संतुलित हैं। और एक बात, जो शायद इस पूरे इंटरव्यू की सबसे ईमानदार लाइन है। कि अब मुझे बात करने के लिए, या ठीक से काम करने के लिए उस चीज की जरूरत नहीं पड़ती।
और फिर शरीर ने जवाब दिया।
आईपीएल 2026। उन्होंने कहा, पिछले आईपीएल में मेरा शरीर फिर से तीस साल का महसूस हो रहा था। मैं जिम कर रहा था, फील्डिंग ड्रिल कर रहा था, ठीक से ट्रेनिंग कर रहा था। उस सीजन में बारह विकेट।
फिर काउंटी। 2026 के सीजन में इक्कीस विकेट, और औसत सिर्फ सोलह के आसपास।
और फिर लॉर्ड्स।
क्रिकेट का मक्का कहलाने वाला मैदान। चहल ने लाल गेंद का अपना आखिरी फर्स्ट क्लास मैच वहीं खेला, नॉर्थैम्पटनशायर की तरफ से, मिडलसेक्स के खिलाफ।
दो अक्टूबर को उन्होंने फर्स्ट क्लास क्रिकेट से संन्यास का ऐलान किया। लिखा कि लाल गेंद की क्रिकेट उनके लिए कभी सिर्फ एक फॉर्मेट नहीं रही। कि वो अपने सफर से सच में संतुष्ट हैं।
और फिर आखिर में ये लिखा, मैं अभी खत्म नहीं हुआ हूं। देश के लिए खेलने की भूख अब भी पूरी तरह जिंदा है।
अब उस शब्द की बात, जिससे ये कहानी शुरू हुई थी। शतरंज।
शतरंज की बाजी जिस शब्द पर खत्म होती है, उसे हम शह-मात कहते हैं। अंग्रेजी में चेकमेट। शब्दों का इतिहास दर्ज करने वाली वेबसाइट एटिमोनलाइन के मुताबिक ये शब्द फारसी के “शाह मात” से आया माना जाता है, जिसका मतलब कुछ ऐसा है कि बादशाह बेबस हो गया, उसके पास कोई चाल नहीं बची।
पर शतरंज खेलने वाला हर बच्चा एक और बात जानता है।
शह और मात एक चीज नहीं हैं।
शह लगती है, तो बाजी खत्म नहीं होती। बस राजा को अपनी जगह से हिलना पड़ता है। एक खाना। सही दिशा में।
जींद का वो लड़का, जिसने कोलकाता में अंडर-बारह की बाजियां जीती थीं, उसे 2025 में जिंदगी ने शह दी। वो मात नहीं थी। उसने राजा को एक खाना हिलाया। रिहैब के दरवाजे तक।
शह लगना हार नहीं है। अपनी जगह से न हिलना हार है।
ये कहानी एक क्रिकेटर के गिरने की नहीं है। ये उस पल की कहानी है, जब एक मशहूर आदमी ने पूरे देश के सामने कहा कि मुझे मदद चाहिए थी, और मैंने ली।
हमारे यहां मर्दों को बचपन से सिखाया जाता है कि रोना नहीं है, कहना नहीं है, संभाल लेना है। और कई घरों में शराब उसी “संभाल लेने” का दूसरा नाम बन जाती है। मेरे घर में बेटा है। मैं चाहता हूं कि वो बड़ा होकर ये जाने कि “मुझसे नहीं संभल रहा” कहना कमजोरी नहीं है।
चहल ने वो गिलास नीचे रखा। और फिर कैमरे के सामने आकर बताया भी।
आज वो छत्तीस साल के हैं। टेस्ट कैप का सपना अधूरा रह गया, और उन्होंने उसे बिना शिकायत के मान लिया है। सफेद गेंद से भारत की जर्सी तक लौटने की भूख अभी जिंदा है। आगे क्या होगा, कोई नहीं जानता।
पर जो आदमी अपना होंठ खिंचने के डर से बोल नहीं पाता था, वो आज कैमरे के सामने सबसे कठिन बात बोल गया।
मेरे लिए उसकी वापसी का सबसे बड़ा विकेट यही है।
जो चहल ने असल में किया, तीन कदमों में:
1. मान लिया कि बात हद से आगे निकल गई है, और खुद ब्रेक मांगा, ताकि टीम को उसकी वजह से नुकसान न हो।
2. रिहैब गए, छब्बीस दिन रहे, और वहां से इस समझ के साथ लौटे कि इसे संभालना कैसे है।
3. परिवार और सबसे अच्छे दोस्त को पास रखा। उन्होंने खुद कहा, मेरा सबसे अच्छा दोस्त और परिवार मेरे साथ थे।
ये कहानी उस आदमी तक पहुंचनी चाहिए, जो हर शाम खुद से कहता है कि आज आखिरी गिलास है, और अगली शाम फिर वही बात कहता है।
मैं खबर के पीछे खड़े उस इंसान को ढूंढता हूं, जिसकी बात स्कोरकार्ड में नहीं आती। यहां हर कोट उसी के मुंह से निकला है जिसका नाम लिखा है, और हर तारीख जांची हुई
आपकी जिंदगी में वो कौन सी बात है, जो आपने सबसे देर से किसी से कही, और कहने के बाद हल्का महसूस हुआ?
साभार राहुल मिश्रा जी

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