मध्य प्रदेश के शहडोल जिले से विशेष पड़ताल
दक्षिण वन मंडल शहडोल के जैतपुर परिक्षेत्र में भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हैं, इसका जीता-जागता सबूत है देवरी नंबर 747 का प्लांटेशन कार्य। यहाँ एक गरीब किसान की गाढ़ी कमाई को सरकारी तंत्र की फाइलों में इस तरह ‘कैद’ कर लिया गया है कि साल भर बाद भी वह बाहर नहीं निकल सकी। इस पूरे खेल में बीट गार्ड आशीष चौधरी की भूमिका अब गंभीर संदेह के घेरे में है।
बीट गार्ड आशीष: वसूली में ‘तेज’, भुगतान में ‘लापता’
पीड़ित किसान कोदूलाल सिंह का आरोप है कि प्लांटेशन के दौरान बीट गार्ड आशीष चौधरी ने सामग्री की सप्लाई तो पूरी तत्परता से ली, लेकिन जब भुगतान की बारी आई तो वह ‘लालीपाप’ थमाने वाले नेता बन गए।
फोन पर सिर्फ आश्वासन: किसान जब भी अपने ₹50,000 मांगता है, बीट गार्ड द्वारा “कल हो जाएगा, परसों हो जाएगा” का राग अलापा जाता है।
गुमराह करने का खेल: आखिर एक साल तक भुगतान रोकना क्या बीट गार्ड की व्यक्तिगत रंजिश है या फिर कमीशनखोरी की कोई बड़ी सेटिंग?
किसान की मजबूरी, विभाग की क्रूरता
किसान कोदूलाल ने बताया कि उसने तार ढुलाई, खाद, खंभा और गिट्टी-रेत जैसे मटेरियल के लिए अपनी साख दांव पर लगाकर बाजार से कर्ज उठाया था। आज किसान कर्जदारों को चेहरा दिखाने लायक नहीं बचा है, जबकि बीट गार्ड और विभाग के अन्य जिम्मेदार अधिकारी अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ रहे हैं।
सिस्टम को खुली चुनौती: “साहब, किसान का पैसा है, पाप लगेगा!”
यह केवल ₹50,000 का बकाया नहीं है, बल्कि सरकारी सेवा की शपथ लेने वाले कर्मचारियों की नीयत पर एक बड़ा सवाल है।
क्या आशीष चौधरी के पास भुगतान रोकने का कोई कानूनी आधार है?
यदि काम संतोषजनक था, तो भुगतान की फाइल को आगे क्यों नहीं बढ़ाया गया?
क्या DFO शहडोल को अंधेरे में रखकर यह सारा खेल निचले स्तर पर खेला जा रहा है?
अंतिम अल्टीमेटम: अब घेरा जाएगा जैतपुर कार्यालय
किसान ने साफ कर दिया है कि बीट गार्ड आशीष चौधरी के खोखले आश्वासनों का वक्त अब खत्म हो चुका है। यदि तत्काल ₹50,000 का भुगतान नहीं हुआ, तो पूरा मामला लेकर किसान कलेक्टर कार्यालय और वन मंडल अधिकारी की चौखट पर दहाड़ेगा। किसान ने चेतावनी दी है कि जैतपुर वन विभाग की इस ‘उधारी राजनीति’ का पर्दाफाश अब सड़क पर उतर कर किया जाएगा।










