पानी से भी नहीं बुझती भीतर सुलगती हुई आग

(कृपया इसे किसी व्यक्ति, स्थान या घटना से न जोड़े..यह व्यक्तिगत राय है)

आज घर के सामने खाली प्लॉट में दो सांड झगड़ गए। पहले मुझे लगा की पास में मकान बन रहा है तो शायद ईंट -पत्थर खाली कर रहे होंगे लेकिन जब लोगों की आवाजें सुनी तो जाकर देखा, दो सांड झगड़ रहे हैं। दोनों सांड अपने-अपने पाले में बराबर डटे हुए थे, कोई पीछे हटने को तैयार नहीं।

आसपास के लोग इकट्ठे हो गए। कुछ राहगीर भी जाते-जाते रुक गए। मैं दौड़कर घर के भीतर गया यह सोचकर कि कहीं लड़ते-लड़ते ये मेरे घर के बाहर खड़ी गाड़ियों से न टकरा जाए ।अगर टकरा गए तो गाडियां डैमेज हो जाएंगी। हम मध्यमवर्गीय लोगों की यह विशेषता होती हैं कि हम खुद से ज्यादा अपनी चीजों से प्रेम करते हैं। खुद डैमेज हो जाए कोई दिक्कत नहीं, चीजें डेमेज नहीं होनी चाहिए क्योंकि हमें पता है कि चीजें कितनी मुश्किल से आती है।

जैसे ही मैं भीतर गया एक राहगीर ने कहा- “भैया मशीन चलाकर इन पर पानी डालिए, ठंडा पानी लगेगा तो ठंडे हो जाएँगे, झगड़ा खत्म हो जाएगा।”.. मैंने घर में काम करने वाले लड़के मिथिलेश को आवाज लगाइ कि जरा मशीन चलाकर पाइप पकड़ा दे। तो वह बोला “चाचा लाइट बंद है।” मतलब पहला ऑप्शन यही खत्म…! अब दूसरा ऑप्शन बचा था कारों को ही यहाँ से हटाकर कहीं दूर रखा जाए। मैं दौड़कर चाबी लेने भीतर आया.. चाबी लेकर बाहर पहुँचा तब तक उन दोनों में समझौता हो चुका था या एक सांड हार मान चुका था। लड़ाई खत्म हो चुकी थी और दोनों सांड अपने-अपने रास्ते जा रहे थे। सब लोग भी अपने-अपने रास्ते चल पड़े।

भीतर आते वक्त मेरे मन में विचार चल रहा था कि क्या शरीर के ऊपर पानी डालने से मन के भीतर लग रही आग को शांत किया जा सकता है…? 

चाहे वह आग किसी भी तरह की हो…? महत्वाकांक्षा की हो, नफरत और ईर्ष्या की हो, वर्चस्व की हो, बदले की भावना की हो या फिर काम भावना की। सांड क्यों लड़ रहे थे पता नहीं, शायद वर्चस्व के लिए , क्योंकि हमने देखा है, पशु- पक्षी भी अपने वर्चस्व की लड़ाई लड़ते रहे हैं।

मनुष्य तो हमेशा ही लड़ता ही आया है कभी महत्वाकांक्षाओं की आग से , कभी अपने वर्चस्व की आग से, कभी ईर्ष्या और नफरत की आग से, कभी बदले की आग से , कभी अपने अधिकारों के लिए तो कभी काम भावना से लगी आग से ग्रसित होकर एक दूसरे को शत्रु समझ कर हमेशा लड़ता ही रहा है।

यदि शरीर पर पानी डाल देने से मन के भीतर लगी आग को शांत किया जा सकता तो फिर देश दुनिया में इतनी लड़ाइयाँ होती ही नहीं। न कोई देश एक दूसरे पर आक्रमण करते, न भाई-भाई से झगड़ता, न परिवार में किसी तरह के झगड़े होते हैं और न ही कोई काम भावना की आग में जलकर किसी के साथ बलात्कार या रेप करता। जैसे ही व्यक्ति के मन में इस तरह की कोई आग जगने लगती, उस पर ठंडा पानी डाल देते और आग समाप्त हो जाती। पर ऐसा होता नहीं है अगर पानी से आग शांत हो जाती तो फिर बड़वानल क्यों जलती..? वहां तो पानी साथ ही उपलब्ध है फिर भी एक बार जलने पर कई दिनों तक बड़वानल शांत नहीं होती।

यदि ऐसा संभव हो कि शरीर के ऊपर पानी डालने से अंदर की आग समाप्त हो जाती तो कुछ ठंडे पानी की बाल्टियाँ ट्रंप काका के ऊपर डाल दें ताकि दुनिया में जितनी भी लड़ाइयाँ वो करवा रहे हैं, वही शांत हो जाए। यदि ऐसा संभव हो तो जब-जब भी व्यक्ति के भीतर काम भावना की आग लगे और वह बलात्कार करने के लिए किसी की तरफ आगे बढ़े तब खुद ही अपने ऊपर दो बाल्टी ठंडा पानी डाल दे तो आग वही बुझ जाएगी और कई मासूम ऐसी आग की लपटों से दग्ध होने से बच जाएंगी । पर यह संभव नहीं है, पानी से आग को नहीं बुझाया जा सकता जब तक की आग लगने के वास्तविक कारण और उसे बुझाने के सही उपाय पर काम नहीं किया जाए।

दरअसल सांड और गाय पानी से हमेशा दूर रहते हैं इसके पीछे वैज्ञानिक कारण है। इनको पानी से ठंड जल्दी लग जाती है, इसीलिए जब सांड झगड़ते हैं और उन पर पानी डाला जाता है तो वे दूर भाग जाते हैं, शरीर के ऊपर पानी डाल देने से मन की आग शांत कभी नहीं होती। मौका मिलते ही फिर जल उठती हैं।

सौ बात की एक बात- भूख की आग भोजन से शांत हो जाती है, पर मन की कुछ अग्नियाँ तृप्ति के बाद भी राख के नीचे सुलगती रहती हैं, उन्हें आसानी से नहीं बुझाया जा सकता और यदि आग काम भावना की है, तो वह तो धधकती हुई ज्वाला है उसे पानी से बुझाना मुश्किल ही नहीं असंभव है।”

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