एक समंदर हैं नगर निगम कमिश्नर सविता प्रधान गौड़……

ये कहानी नहीं सत्य गाथा है, एक आदिवासी महिला की जो समाज के लिए प्रेरणा श्रोत हैं, जिन्होंने सक्सेस का फार्मूला उन सभी महिलाओं को सिखाया हैं जो समाज में शोषित हैं और अभाव में हैं।

बीबीसी लाईव का “आरोग्य अतुल्य सम्मान समारोह” नगर निगम सिंगरौली में 15 मार्च को होना सुनिश्चित हुआ और मैं 6 जनवरी 2026 को ऊर्जाधानी सिंगरौली पहुंचा कलेक्टर श्री गौरव बैनल और कमिश्नर श्री मति सविता प्रधान गौड़ से पहले ही मीटिंग के लिए टाइम मिल चुका था, श्री गौरव बेनल से मुलाक़ात हुई और हमने अपना आने का प्रयोजन बताया उन्होंने बहुत गर्म जोशी से हमारे काम कि सराहना की और सहयोग के लिए आश्वस्त किया फिर मुझसे उन्हों ने कहा कि एक मीटिंग कमिश्नर मैडम से भी कर लीजिएगा।

दूसरे दिन का समय कमिश्नर मैडम से मिलने का पहले ही निर्धारित था, चूंकि मैडम कुछ दिनों से छुट्टी में चल रहीं थी तो वापस आने के बाद पेंडिंग काम निपटाया फिर मुझे मिलने को बुलाया, (मुझे कुछ ज्यादा समय तक इंतजार करना पड़ा) खैर मिलते ही मैडम ने बैठने को कहा और पानी मंगाया इस बीच हमने अपने आने का प्रयोजन बताया वो खुश हुईं और स्वास्थ्य अधिकारी श्री बालगोविंद चतुर्वेदी को बुलाया और मेरा नोडल अधिकारी नियुक्त कर दिया। मीटिंग खत्म हुई साथ ही हर संभव मदद के लिए भी आश्वस्त किया…..

कार्यक्रम में मुझे पूरा सहयोग दोनों IAS अधिकारियों का मिला बीच बीच में हम मिलते रहते थे, बहुत अच्छा कार्यक्रम सिंगरौली में हुआ और हम वापस आ गए, पर मैडम को लेकर मेरी विचारधारा हमेशा सहानुभूति वाली ही रही। आने के बाद हमने R&D किया तो कमिश्नर सविता प्रधान गौड़ तो एक समंदर निकली वो सपाट चेहरा वो शांत व्यवहार कितने तूफानों का सामना किया था।

फ़र्श से अर्श तक कमिश्नर सविता प्रधान की वो दर्दनाक कहानी जो खून जमा देगी!

महज 16 साल की उम्र में शादी हो गई सविता प्रधान की।

एक गरीब आदिवासी परिवार की बेटी, जो सपने देखती थी, लेकिन जिंदगी ने उसे नर्क का टिकट थमा दिया।

शादी के बाद ससुराल बन गई जलती हुई आग।

पति के सामने सबके सामने गालियां, थप्पड़, लातें और बेइज्जती रोज का हिस्सा बन गई।

घर की सफाई, बर्तन, कपड़े धोना — सब कुछ नौकरानी की तरह।
खाना? वो भी मुश्किल।

सविता खुद बताती हैं — “मैं कई बार अपनी अंडरगारमेंट्स में रोटी छिपाकर बाथरूम जाती थी और वहाँ चुपके से सिर्फ रोटी खाकर पेट भरती थी।”

शोषण की आग रोज भड़कती गई।

छोटी-छोटी बातों पर पीटना आम हो गया।

माथा फट गया, हाथों पर चाकू के निशान, पीठ पर जलने के घाव —
शरीर पर हर जख्म उनकी कहानी चीख-चीखकर बयान करता था।

एक दिन पिता आए।
सविता रो-रोकर बोली — “मुझे घर ले चलो।”

पिता ने वादा किया — “शाम तक आऊंगा और ले जाऊंगा।”

लेकिन शाम हुई, रात हुई… पिता नहीं आए।

उस दिन सविता को एहसास हो गया — इस नरक से उसे बचाने कोई नहीं आने वाला।“

मैं फांसी लगाने ही वाली थी…

”दो बच्चों की मां बन चुकी थीं सविता।

फिर भी अत्याचार थमने का नाम नहीं ले रहा था।

एक दिन हिम्मत टूट गई।

बच्चों को सुलाया, छोटे बेटे को दूध पिलाया, माथा चूमा — जैसे आखिरी बार।

स्टूल खींचा, पंखे पर साड़ी बांधी और फांसी लगाने को तैयार हो गईं।

ठीक उसी पल खिड़की से सास का चेहरा दिखा।

सास ने उन्हें देखा… लेकिन न रोका, न कुछ बोला।
चेहरा बिल्कुल भावहीन।

वे चुपचाप चली गईं, जैसे कुछ हुआ ही न हो।

उस पल सविता के अंदर कुछ टूटा और कुछ जागा।

वे बोलीं — “मैं इन लोगों के लिए अपनी जान नहीं दे सकती।”

फांसी का फंदा उतारा, हिम्मत बटोरी और ससुराल से भाग निकलीं।

बाल्टी भर पेशाब फेंक दिया… बच्चों के सामने!

ससुराल छोड़कर चचेरी बहन की भाभी के घर शरण ली।
केवल 2700 रुपये और दो बच्चे साथ लेकर शुरू हुई नई जिंदगी।

दिन में पार्लर में काम, शाम को ट्यूशन, रात को पढ़ाई।

भूख, थकान, ताने — सब सहा।

लेकिन पति का साया अभी भी पीछा नहीं छोड़ रहा था।

वो अचानक आता, बच्चों के सामने मारपीट करता।

एक दिन तो बेहद शर्मनाक घटना हुई —
एग्जाम देने जा रही थीं सविता।

पति ने बाल्टी में पेशाब किया और उनके ऊपर फेंक दिया!

बच्चों के सामने पूरा अपमान।सविता ने रोया नहीं।

फिर से नहाया, कपड़े बदले और सीधे एग्जाम हॉल पहुंच गईं।

उनका दिल अब पत्थर बन चुका था।

पहले अटेम्प्ट में ही MP PCS क्रैक, फिर UPSC में IAS!

अकेले बच्चों की परवरिश करते हुए सविता ने पढ़ाई नहीं छोड़ी।

पहले प्रयास में ही मध्य प्रदेश राज्य सिविल सेवा परीक्षा (PCS) पास कर ली।

आदिवासी छात्रा होने के नाते सरकार ने उन्हें तीनों चरण पास करने पर 75,000 रुपये की छात्रवृत्ति दी।

फिर 2017 में UPSC का फॉर्म भरा।

पहले ही अटेम्प्ट में प्रीलिम्स, मेन्स और इंटरव्यू क्लियर करके IAS अधिकारी बन गईं।

आज सविता प्रधान एक शक्तिशाली IAS अधिकारी हैं।

वे अपने पद का इस्तेमाल गरीब, खासकर आदिवासी और दलित महिलाओं-लड़कियों की मदद के लिए करती हैं।

उनका संदेश साफ है —

“कोई भी लड़की चुपचाप सहन न करे। शिक्षा और हिम्मत से हर नर्क से निकला जा सकता है।”

यह कहानी सिर्फ सफलता की नहीं, जिंदा रहने की, लड़ने की और जीतने की है।

सविता प्रधान ने साबित कर दिया —

फ़र्श से अर्श तक का सफर दर्द, अपमान और मौत के मुंह से गुजरकर भी तय किया जा सकता है।

एक सच्ची योद्धा। एक असली प्रेरणा।

सविता प्रधान — सलाम है आपको!

– प्रभंजन सिंह (प्रधान संपादक)

(तथ्यों पर आधारित — Economic Times, Times of India, India Today आदि रिपोर्ट्स से सत्यापित)

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