सिंगरौली के राजनीतिक कोठे पर मुजरा करता नगरीय प्रशासन….

मध्य प्रदेश की सबसे भ्रष्ट नगर निगम सिंगरौली की नई कहानी

13 साल ‘नो प्लाट’ का खेल, अब कौड़ियों में करोड़ों की जमीन! सिंगरौली नगर निगम पर बड़ा सवाल

नगर निगम की कार्यप्रणाली एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है। 13 वर्षों तक आम जनता को “कोई प्लाट उपलब्ध नहीं” का हवाला देकर टालने वाला निगम अब अचानक करोड़ों की जमीन निकालकर उसे बेहद कम कीमत पर विधायक को सौंप देता है। यह मामला अब महज एक आवंटन नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर रहा है।

सूत्रों के अनुसार, जिस जमीन का सौदा हुआ है वह पहले आरक्षित श्रेणी में थी। आरोप है कि विधायक को लाभ पहुंचाने के लिए इसे पहले अनारक्षित किया गया और फिर बिना किसी पारदर्शी प्रक्रिया के आवंटन कर दिया गया। न तो MIC (मेयर इन काउंसिल) को प्रस्ताव भेजा गया, न ही कोई ओपन टेंडर कराया गया—जो कि नियमों के तहत अनिवार्य प्रक्रिया मानी जाती है।

चौंकाने वाली बात यह भी सामने आई है कि इस जमीन के लिए तीन लोगों ने आवेदन किया था, लेकिन कथित तौर पर दो आवेदकों से लिखवा लिया गया कि वे जमीन नहीं लेना चाहते। इसके बाद रास्ता साफ कर विधायक को यह जमीन दे दी गई। सवाल उठता है कि जब टेंडर प्रक्रिया “मैनेज” नहीं हो पाती, तो फिर विधायक के लिए नियमों में ढील क्यों?

आरोपों के केंद्र में नगर निगम के कमिश्नर और राजस्व अधिकारी आरपी वैश्य बताए जा रहे हैं। सूत्रों का दावा है कि पूरी फाइल इस तरह तैयार की गई कि कागजों में सब कुछ वैध दिखे, लेकिन असल में यह एक बड़ा खेल हो। इतना ही नहीं, परिषद की 1 अप्रैल को होने वाली बैठक से पहले पार्षदों और MIC सदस्यों को “संतुष्ट” करने की कोशिशें भी जारी हैं, ताकि इस मुद्दे पर कोई सवाल न उठे और फाइल सामने न आए।

पार्षद रामगोपाल पाल ने खुलकर आरोप लगाया है कि यह जमीन फर्जी तरीके से कौड़ियों के दाम पर दी गई और इसमें महापौर की अनुमति तक नहीं ली गई। उनका कहना है कि यदि परिषद में फाइल आ गई, तो पूरा मामला उजागर हो सकता है।

इधर, नगर निगम की कार्यशैली पर भी सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि कमिश्नर का अधिकतर समय वीआईपी व्यवस्थाओं और बाहरी ठिकानों—जैसे NTPC के बंगलों—में बीतता है, कमिश्नर शायद भूल गई हैं कि वो पब्लिक सर्वेंट हैं कोई महारानी नहीं हैं, मैडम शहर की मूल समस्याओं से दूरी बनाई रहती है। यह भी चर्चा में है कि जनप्रतिनिधियों को खुश रखने के लिए नियमों को दरकिनार कर फैसले लिए जा रहे हैं।

पूरे मामले ने अब “सिस्टमेटिक लूट” और प्रशासनिक मिलीभगत की आशंकाओं को और गहरा कर दिया है।
जरूरत है कि पिछले 13 वर्षों के सभी प्लाट रिकॉर्ड की जांच हो आरक्षित से अनारक्षित करने की प्रक्रिया की समीक्षा हो बिना टेंडर और MIC अनुमति के हुए आवंटन की वैधता तय हो संबंधित अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों की भूमिका स्पष्ट की जाए

अगर समय रहते निष्पक्ष जांच नहीं हुई, तो यह मामला सिर्फ एक घोटाले तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भविष्य में सरकारी संपत्तियों के “चयनित बंटवारे” की खतरनाक परंपरा बन सकता है।
अब सवाल सिर्फ एक जमीन का नहीं, पूरे सिस्टम की साख का है नगर निगम सिंगरौली की किस्मत भी कैसी लिखी गई कि सारे भ्रष्टाचारी घूमफिर कर खजाने को लूटने फिर वापस आ गए, देखना है कि एक अकेले गौरव बेनल कलेक्टर सिंगरौली ईमानदारी की मशाल लेकर कब तक चलेंगे।

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