कल एक पोस्ट देखी शोले के जय-मौसी स्टाइल में,
नाना चले गए, अभिनेता अच्छे थे लेकिन व्यक्ति के तौर पर इंसान अच्छे नहीं थे, उन्होंने क्रांतिवीर तिरंगा जैसी कई सुपरहिट फिल्में दी , लेकिन पिछले कई दशकों से अपनी पत्नी के साथ नहीं रहते थे, उनके मनीषा कोइराला, आयशा जुल्का के साथ रिश्ते भी सुर्खियों में रहे..
एक अच्छे अभिनेता को खो दिया लेकिन व्यक्ति के तौर पर….?
अब मेरा सवाल ये है कि एक अच्छा व्यक्ति होने की क्या पहचान है?
क्या इतनी ही कि उसकी अपनी पत्नी से अच्छी बनती हो?
क्या किसी के निजी जीवन के उतार-चढ़ाव या उनके गुस्सैल स्वभाव से ये तय हो जाता है कि वो इंसान कैसा था?
दुनिया में न जाने कितने ऐसे जोड़े हैं जिनकी आपस में नहीं बनती और वे अलग हो जाते हैं। कई बार लोग कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटते हैं और एक-दूसरे पर कीचड़ उछालते हैं।
नाना पाटेकर और उनकी पत्नी नीलकांति ने साल १९७८ में शादी की, दो बेटे हुए, जिसमें उनके के बेटे दुर्वासा का दो साल की छोटी आयु में दुखद निधन हो गया, फिर कुछ सालों बाद जब नहीं बनी तो अलग हो गए, लेकिन उन्होंने कभी औपचारिक रूप से तलाक नहीं लिया और न ही कभी एक-दूसरे की सार्वजनिक रूप से बुराई की।
इवन एक बार मंच पर जब किसी ने उनकी पत्नी नीलकांति के बारे में पूछा, तब भी उन्होंने बहुत ही गर्व और सम्मान के साथ कहा था कि
“नीलकांति एक बहुत ही बेहतरीन इंसान हैं, बेहद ईमानदार और जो कुछ उनके पास है, उसी में संतुष्ट रहने वाली महिला हैं। जब मैं मराठी थिएटर करता था और मुझे प्रति शो केवल 50 रुपये मिलते थे, तब वे एक बैंक में ऑफिसर थीं और 2500 रुपये महीना कमाती थीं।
आज मैं जो कुछ भी हूँ, उनकी वजह से हूँ क्योंकि उन्होंने हमेशा मुझसे कहा था कि तुम जो काम करना चाहते हो करो, मुझे पता है कि आज नहीं तो कल तुम पैसे कमा ही लोगे।”
अपने पूरे करियर का श्रेय अपनी पत्नी को देना और अलग होने के बाद भी उनका इतना सार्वजनिक सम्मान करना, क्या एक अच्छे इंसान की पहचान नहीं है?
ना जाने कितने किस्से, कितनी बातें हैं उनकी जो दिखती हैं कि वो कितने दरियादिल और अच्छे इंसान थे।
नाना पाटेकर के निधन के बाद मशहूर निर्देशक रोहित शेट्टी ने सोशल मीडिया पर एक बेहद भावुक और मज़ाकिया संश्मरण शेयर किया
उन्होंने बताया कि जब फिल्म गोलमाल अगेन में कैमियो के लिए उन्होंने नाना पाटेकर से बात की और पूछा,
“दादा, आपकी फीस?”
तब नाना पाटेकर ने अपने उसी अंदाज में कहा था
“अबे Chu####, तुझसे फीस लूंगा? एक NGO का नंबर दे रहा हूँ, वहाँ डोनेट कर देना।

जिस पैसे के पीछे आज पूरी दुनिया भागती है, उसे नाना बिना किसी दिखावे के अनाथ बच्चों के लिए छोड़ देते थे।
क्या बॉलीवुड का कोई और सुपरस्टार ऐसा कर सकता है?
नाना पाटेकर ने 1991 में आई अपनी फिल्म प्रहार के लिए मराठा लाइट इन्फैंट्री के साथ 3 साल की कमांडो ट्रेनिंग ली थी और ये ट्रेनिंग सिर्फ फिल्म के रोल के लिए ही थी, न कि सेना में भर्ती होने के लिए। लेकिन इस ट्रेनिंग के बाद उन्हें Territorial Army में कैप्टन की रैंक मिली। इसलिए जब 1999 में कारगिल युद्ध छिड़ा, तो उन्होंने सिर्फ़ मानद पद के लिए अपना फर्ज निभाना सबसे जरूरी समझा।
उन्होंने तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडीस से तुरंत विशेष अनुमति ली और बॉर्डर पहुँच गए। वहाँ उन्होंने 60 दिनों तक क्विक रिएक्शन टीम के हिस्से के रूप में द्रास, सोपोर और लेह जैसे खतरनाक अग्रिम मोर्चों पर भारतीय जवानों के साथ तैनात रहे।
इस कठिन सेवा में उनका वजन 76 किलो से घटकर 56 किलो रह गया था।
ये उनकी देशभक्ति का सबसे बेमिसाल उदाहरण है।
जब महाराष्ट्र में सूखे के कारण किसान खुदकुशी कर रहे थे, तब नाना पाटेकर ने उनके दुख में शामिल होकर अपनी कमाई का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा दान करना शुरू कर दिया। अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर नाम फाउंडेशन की शुरुआत की।
अपने लिए डेढ़ करोड़ की लक्ज़री गाड़ी लेने जा रहे थे, लेकिन जब टीवी पर रोते हुए पीड़ित किसान परिवारों देखें तो उनके घर गए, उनके आंसू पोंछे और हर परिवार को 15,000 की तत्काल आर्थिक मदद दी।
उनकी संस्था ने सूखाग्रस्त गांवों में नदियां और नहरें खुदवाने का काम किया ताकि किसानों को हमेशा के लिए पानी मिल सके।
करोड़ों कमाने के बाद भी वे खुद अपनी माँ के जीवित रहने तक उनके साथ एक बेहद साधारण से 1BHK फ्लैट में रहते थे और अपनी मां के साथ सादगी से चटनी-भाकरी खाते थे।
हाँ, ये भी सच है कि उनका स्वभाव थोड़ा आक्रामक था, वे शॉर्ट-टेंपर्ड थे और मनीषा कोइराला या आयशा जुल्का जैसी सह-कलाकारों के साथ उनके रिश्तों को लेकर विवाद भी हुए।
लेकिन इंसान कभी भी ब्लैक या व्हाइट नहीं होता, वह ग्रे होता है यानी हर इंसान में कुछ कमियाँ और कुछ खूबियाँ होती हैं।
अगर तराजू पर तौला जाए, तो एक इंसान जो अपने देश के लिए बॉर्डर पर खड़ा हो सकता है, अपनी पत्नी का सम्मान करता हो, और गरीबों के लिए अपना सब कुछ लुटा देता हो, उसे सिर्फ इसलिए “बुरा” नहीं कहा जा सकता क्योंकि उसके स्वभाव में गुस्सा था या उसके व्यक्तिगत जीवन में कुछ कमियाँ थीं।
अच्छा व्यक्ति होना इस बात से तय होता है कि आपने दुनिया को क्या दिया और इस पैमाने पर नाना पाटेकर एक बेहद महान, सच्चे और राष्ट्रभक्त इंसान थे।
शत-शत नमन नाना, आप अमर हो गए , हिंदू धर्म के पवित्र श्राद्ध पक्ष में गए हो, और हिंदू धर्म में मान्यता है कि इस पक्ष में स्वर्ग के दरवाजे खुले रहते हैं..
आप सीधा स्वर्ग गए हो नाना, अब लोग कहते रहे डेविल चला गया, लेकिन आपकी हिंदू मान्यताओ के अनुसार आप ऐसे डेविल निकले, जिसे सीधे स्वर्ग मिला!










