IPL सट्टेबाजी मामले में सतीश सनपाल के खिलाफ FIR रद्द करने से MP हाईकोर्ट का इनकार…

भोपाल। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कथित IPL सट्टेबाजी से जुड़े मामले में एक आरोपी के खिलाफ दर्ज FIR रद्द करने से इनकार कर दिया। दुबई से सट्टा कारोबार संचालित करने के मास्टरमाइंड होने के आरोप में जबलपुर के चार थानों में दर्ज करीब आधा दर्जन एफआईआर निरस्त कराने की मांग को लेकर सतीश सनपाल ने हाईकोर्ट की शरण ली थी। हाईकोर्ट के जस्टिस हिमांशु जोशी की एकलपीठ ने सुनवाई के बाद सभी याचिकाएं खारिज कर दीं। कोर्ट ने कहा कि केवल इसलिए आरोपी को राहत नहीं दी जा सकती क्योंकि सह-आरोपी की FIR पहले रद्द की जा चुकी है।
जस्टिस हिमांशु जोशी ने कहा कि Parity के सिद्धांत को यांत्रिक तरीके से लागू नहीं किया जा सकता,जब आरोपियों की भूमिका और उनके खिलाफ उपलब्ध साक्ष्यों का अलग-अलग मूल्यांकन जरूरी हो। पूरे मामले में पुलिस ने कथित अवैध IPL सट्टेबाजी की सूचना पर छापेमारी की थी। जांच के दौरान करीब ₹21 लाख नकद और अन्य सामग्री बरामद हुई।अभियोजन के अनुसार, जांच में सट्टेबाजी के लिए शेल कंपनियों के इस्तेमाल की बात सामने आई और सह-आरोपियों के बयानों से याचिकाकर्ता की कथित भूमिका भी सामने आई।
याचिकाकर्ता ने दलील दी कि सह-आरोपी संजय सनपाल की FIR हाईकोर्ट पहले ही रद्द कर चुका है,इसलिए उसे भी समान राहत मिलनी चाहिए। हालांकि, हाईकोर्ट ने कहा कि संजय सनपाल को राहत उसके खिलाफ उपलब्ध विशेष तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर दी गई थी। याचिकाकर्ता यह साबित नहीं कर सका कि उसके खिलाफ सामग्री पूरी तरह समान है।

सतीश सनपाल की ओर से दायर याचिकाओं में कहा गया था कि छापेमारी के दौरान गिरफ्तार आरोपियों के धारा -161 के तहत दर्ज बयानों के आधार पर उसे कथित सट्टेबाजी रैकेट का मास्टरमाइंड और अपराध में शामिल बताया गया है। आरोप यह भी है कि उसने अपने और अन्य लोगों के नाम पर फर्जी शेल कंपनियां खोलीं और उनमें भारी लेनदेन कर सरकार के साथ धोखाधड़ी की। याचिका में कहा गया कि उसे गलत तरीके से उन कंपनियों का डायरेक्टर बताया गया है,जबकि ये कंपनियां वास्तव में मौजूद हैं और कानून के अनुसार रिटर्न दाखिल करती हैं।
याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि जांच के दौरान ऐसा कोई सबूत नहीं मिला,जिससे कथित सट्टेबाजी गतिविधियों में उसकी सक्रिय भागीदारी, साजिश,वित्तीय लेनदेन या बातचीत साबित हो सके। वह दुबई में रहता है और घटना के समय भारत में मौजूद नहीं था। अभियोजन पक्ष ने जिन चैट का हवाला दिया है, उनमें याचिकाकर्ता या उससे जुड़े किसी मोबाइल नंबर का उल्लेख नहीं है। याचिका में और क्या कहा गया?
याचिका में यह भी कहा गया कि सह आरोपी के मोबाइल फोन की फोरेंसिक जांच में उसके खिलाफ कोई आपत्तिजनक सबूत नहीं मिला। उसके बैंक खाते से कोई लेनदेन नहीं हुआ और न ही उसके पास से कोई रकम बरामद की गई। कथित सट्टेबाजी गतिविधियों से उसे जोड़ने वाला कोई मनी ट्रेल, इलेक्ट्रॉनिक कम्युनिकेशन, चैट, ईमेल या अन्य ठोस सबूत भी नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि FIR और चार्जशीट में सट्टेबाजी,नकद बरामदगी और कंपनी से जुड़े दस्तावेजों सहित प्रथम दृष्टया पर्याप्त सामग्री मौजूद है। इस आधार पर हाईकोर्ट ने FIR रद्द करने की याचिका खारिज कर दी!

और पढ़ें