सफेद खादी, मन में ‘गाँठ’: मीनाक्षी नटराजन V/S गांधीवाद:
मैडम की ‘खुन्नस’ ने डुबोई कांग्रेस? : सिर्फ खादी पहनने से कोई गांधी नहीं बनता!
वाकई मैडम के भीतर गांधीवादी विचारधारा जिंदा है, तो लगातार दो हार के बाद भी पद की इतनी लालसा क्यों?
भोपाल/मंदसौर। मध्य प्रदेश की राज्यसभा सियासत में इस वक्त नंबर गेम से ज्यादा चर्चा विचारधारा के ‘मुखौटों’ की हो रही है। कांग्रेस ने राहुल गांधी की करीबी मानी जाने वाली मीनाक्षी नटराजन को राज्यसभा के रण में उतारा है। गणित सीधा है—जीत के लिए 58 वोट चाहिए और कांग्रेस के पास 62 विधायक हैं। लेकिन बीजेपी ने मुकेश केवट को तीसरा उम्मीदवार बनाकर जो ‘सेंधमारी’ का जाल बुना है, उसने कांग्रेस के खेमे में धुकधुकी बढ़ा दी है।
पर, असली खेल तो नटराजन के उस ‘गांधीवादी’ तमगे को लेकर हो रहा है, जिसे कांग्रेस आलाकमान चमकाने में जुटा है। मंदसौर और नीमच की जनता से लेकर खुद कांग्रेस के जमीनी कार्यकर्ता आज एक ही सवाल पूछ रहे हैं— क्या सिर्फ सफेद खादी पहन लेने से कोई गांधी बन जाता है?
‘वन मैन आर्मी’ या बदलापुर की राजनीति!:-
कांग्रेस के भीतर ही दबी जुबान में (और अब तो खुलकर) नेता मैडम की कार्यशैली पर सवाल उठा रहे हैं। कार्यकर्ताओं का कहना है कि गांधीजी कभी मन में मैल या ‘गाँठ’ नहीं रखते थे, लेकिन मैडम की डिक्शनरी अलग है। आरोप है कि वे “मन में गांठ बांधकर बैठती हैं और मौका मिलते ही सियासी तौर पर निपटा देती हैं।
नीमच और मंदसौर जिले के कई कद्दावर नेताओं का राजनीतिक भविष्य सिर्फ इसलिए हाशिए पर चला गया क्योंकि वे मैडम के ‘यस मैन’ नहीं बन पाए। विधानसभा टिकटों के बंटवारे में उनकी मर्जी के आगे बड़े-बड़े सूरमा सरेंडर कर देते हैं, क्योंकि उनके सिर पर ‘दिल्ली’ का हाथ है।
कथनी और करनी का अंतर: एक नजर में
महात्मा गांधी का गांधीवाद मीनाक्षी नटराजन का ‘कथित’ गांधीवाद, जानिए क्यों है संदेह के घेरे में!
त्याग और निस्पृहता: गांधीजी को कभी किसी पद की लालसा नहीं थी।
पद की भूख: 2009 में चुनाव जीता, फिर लगातार दो लोकसभा चुनाव हारीं, और अब ‘चोर दरवाजे’ (राज्यसभा) से संसद पहुंचने की बेताबी।
संघर्ष और आंदोलन: देश को जगाने के लिए दांडी यात्रा और भारत छोड़ो जैसे अनगिनत जमीनी संघर्ष किए।
मैडम की गुटीय राजनीति: नीमच-मंदसौर में कांग्रेस को मजबूत करने के बजाय संगठन को बिखराव की कगार पर ला खड़ा किया।
अहिंसा और क्षमा: विरोधियों को भी प्रेम और क्षमा से जीतने का संदेश दिया।
मैडम की खुन्नस और उपेक्षा: अपनों को ही राजनीतिक रूप से खत्म करने और बदला लेने की भावना के आरोप।
विडंबनाओं का ‘पॉलिटिकल कॉकटेल’:-
नटराजन के राजनीतिक इतिहास में विडंबनाओं की लंबी फेहरिस्त है!
खास ही बने ‘खासमखास’ विद्रोही:
कभी सुवासरा के विधायक हरदीप सिंह डंग को मैडम का सबसे बड़ा सिपहसालार माना जाता था। लेकिन विडंबना देखिए, जब कमलनाथ सरकार को गिराने की बारी आई, तो सबसे पहले यही ‘सरदार जी’ बगावत का झंडा लेकर मैदान में उतरे।
संसदीय क्षेत्र में कांग्रेस साफ:
साल 2008 में जब से मैडम ने मंदसौर-नीमच की राजनीति में कदम रखा है, तब से पूरी कांग्रेस गुटबाजी में बिखर गई है। नतीजा? आठ विधानसभा सीटों में से आज कांग्रेस के पास सिर्फ एक सीट (मंदसौर से विपिन जैन) बची है।
बड़ा सवाल: पद की ये लालसा क्यों?
“गांधीवाद का मतलब आत्ममुग्धता या तानाशाही नहीं होता। गांधीजी ने सत्ता को ठुकराया था, जबकि यहाँ सत्ता के लिए छटपटाहट साफ दिख रही है।
जनता और त्रस्त कांग्रेस कार्यकर्ता पूछ रहे हैं कि अगर वाकई मैडम के भीतर गांधीवादी विचारधारा जिंदा है, तो लगातार दो हार के बाद भी पद की इतनी लालसा क्यों? क्या राज्यसभा की यह सीट वाकई किसी जमीन से जुड़े कार्यकर्ता को नहीं मिल सकती थी?
बहरहाल, बीजेपी के मुकेश केवट मैदान में हैं और कांग्रेस के 62 विधायकों के ईमान पर सबकी नजरें हैं। देखना दिलचस्प होगा कि ‘गांधीवाद’ के नाम पर थोपी गई इस उम्मीदवारी को खुद कांग्रेसी विधायक कितना पचा पाते हैं, या फिर राज्यसभा चुनाव के नतीजे मैडम को कोई नया ‘पॉलिटिकल लेसन’ सिखाते हैं!
ईमानदारी का इनाम या कमलनाथ से पुराना हिसाब? मीनाक्षी नटराजन के इस फैसले के पीछे का असली खेल… See More
मध्यप्रदेश कांग्रेस में एक बार फिर वो हुआ है जिसने सियासी गलियारों में भूकंप ला दिया है। कयास लगाए जा रहे थे कि दिग्गज नेता और सूबे के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ को कांग्रेस राज्यसभा भेजेगी, लेकिन ऐन वक्त पर उनका पत्ता काट दिया गया। आलाकमान ने दांव खेला है राहुल गांधी की बेहद करीबी और सादगी का चोला ओढ़े नेता मीनाक्षी नटराजन पर!
सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में मीनाक्षी नटराजन की ‘कथित ईमानदारी’ के किस्से इस वक्त जमकर तैर रहे हैं। दावा किया जा रहा है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने उन्हें करीब 5 करोड़ रुपये का चुनावी फंड दिया था, जिसमें से उन्होंने 4 करोड़ से ज्यादा रुपये वापस पार्टी फंड में जमा करा दिए। यही नहीं, विधानसभा चुनाव में भी उन्होंने 75% पैसा वापस कर दिया था।
लेकिन राजनीति को करीब से देखने वाले जानते हैं कि “जो दिखता है, वो होता नहीं; और जो होता है, वो दिखता नहीं!” आइए इस पूरी कहानी के पीछे के पहलुओं पर नजर डालते हैं!
1. चुनाव हारने के लिए मिलता है पैसा या जीतने के लिए?
सोशल मीडिया पर इस बात को लेकर मीनाक्षी नटराजन की तारीफों के पुल बांधे जा रहे हैं कि उन्होंने पैसे वापस कर दिए। लेकिन तीखा सवाल यह है कि क्या चुनाव कंजूसी से दिल जीतने के लिए लड़ा जाता है? 2024 के लोकसभा चुनाव में जब कांग्रेस का एक-एक कार्यकर्ता पैसों की कमी का रोना रो रहा था, तब फंड को बचाकर वापस रख लेना समझदारी है या चुनावी मैदान में हथियार डाल देना? आलोचकों का कहना है कि जब आप पूरा पैसा खर्च ही नहीं करेंगे, तो जमीन पर कार्यकर्ताओं को संसाधन कैसे मिलेंगे? नतीजा? हार!
2. कमलनाथ जैसे कद्दावर नेता की ‘अहंकार’ से बलि?
कमलनाथ, जिन्होंने दशकों तक मध्य प्रदेश में कांग्रेस को अपने दम पर खड़ा रखा और फंड से लेकर संगठन तक को संभाला, उन्हें इस तरह ‘इग्नोर’ करना आत्मघाती साबित हो सकता है। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि केवल “गांधीवादी छवि” और “रहन-सहन में सादगी” के नाम पर इतने बड़े जनाधार वाले नेता को दरकिनार करना राहुल गांधी की एक और रणनीतिक भूल हो सकती है। क्या कांग्रेस अब सिर्फ ‘पक्के ईमानदारों’ की फौज खड़ी करके चुनाव जीतना चाहती है, चाहे जमीन पर वोट मिले न मिले
3. ‘गांधीवादी’ इमेज का पीआर (PR) स्टंट?
आज के दौर में जब राजनीति पूरी तरह हाईटेक और आक्रामक हो चुकी है, वहां ‘फकीरी’ और ‘सादगी’ का यह नैरेटिव कहीं जनता को गुमराह करने का जरिया तो नहीं? सोशल मीडिया पर यह कसीदे इसलिए गढ़े जा रहे हैं ताकि कमलनाथ को हटाने के फैसले पर डैमेज कंट्रोल किया जा सके। जनता पूछ रही है कि अगर वह इतनी ही लोकप्रिय और सच्ची सिपाही हैं, तो वह अपने दम पर चुनाव जीतकर संसद क्यों नहीं पहुंच पातीं? क्यों उन्हें हमेशा राज्यसभा के ‘पिछले दरवाजे’ का सहारा लेना पड़ता है?
क्या मीनाक्षी नटराजन को राज्यसभा भेजना वाकई उनकी ईमानदारी का इनाम है, या फिर यह कमलनाथ जैसे बड़े और स्वतंत्र चेहरों को किनारे लगाने की दिल्ली दरबार की एक और गहरी साजिश है? क्या इस ‘त्याग और सादगी’ के ड्रामे से मध्यप्रदेश में खत्म होती कांग्रेस को दोबारा जिंदा किया जा सकेगा? जवाब वक्त देगा, लेकिन फिलहाल कांग्रेस के अंदरूनी खेमे में सुलगती चिंगारी किसी भी वक्त दावानल बन सकती ।










