बघेलखंड के आद्य संपादक लाल बलदेव सिंह के अवदान के सम्मान में सभागृह का नामकरण

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के रीवा परिसर में स्मृति को अक्षुण्ण बनाने की सार्थक पहल – विजयदत्त श्रीधर

विध्य के हृदय स्थल रीवा में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय भोपाल का सर्व सुविधा युक्त भव्य परिसर आकार ले चुका है विश्वविद्यालय के सभागार का नाम बघेलखंड के आद्य संपादक लाल बलदेव सिंह के यशस्वी अवदान के सम्मान में ‘लाल बलदेव सिंह सभागृह’ किया गया है विश्वविद्यालय के विगत दिवस संपन्न कार्यक्रम में उपमुख्यमंत्री राजेन्द्र शुक्ल ने इस संकल्प की घोषणा की। संपूर्ण बघेलखंड में कलम के इस महान पुरखे की स्मृति को अक्षुण्ण बनाने की पहल का सगर्व स्वागत किया जा रहा है
उल्लेखनीय है कि लाल बलदेव सिंह विध्य अंचल के आद्य संपादक है वे जनपक्षधरता की पत्रकारिता के पुरोधा थे। लोकतंत्र के आधारभूत सिद्धांतों के विलक्षण व्याख्याकार थे। राज्य के निर्णयों में लोकहितैषिता के प्रबल समर्थक थे। यदि कोई निर्णय जनसाधारण के हितों और अधिकारों के विरुद्ध होता था तब वे पुरजोर विरोध करने से पीछे नहीं हटते थे। उनका संपादन काल (1887-1902) तत्कालीन परिस्थितियों के दृष्टिगत निश्चित रूप से क्रान्तिधर्मी रहा है
लाल बलदेव सिंह का जन्म बसंत पंचमी, विक्रम संवत् 1925 (फरवरी, 1869 ई) को रीवा राज्य के ग्राम देवराजनगर में हुआ। 35 वर्ष की अल्पायु में सन् 1903 में आपका देहावसान हुआ कलकत्ता विश्वविद्यालय में अध्ययन करते हुए आपका रुझान मुद्रण कला और पत्र संपादन की ओर हुआ। परीक्षा के बाद वे अपने साथ मुद्रणालय लेकर रीवा लौटे अप्रैल 1887 में उन्होंने रीवा में भारतभ्राता मुद्रणालय की स्थापना की। पाक्षिक पत्र ‘भारतभ्राता’ का संपादन-प्रकाशन आरंभ किया। भारतभ्राता का ध्येय उद्घोष था-
लसत श्याम अभिराम के मुदित कृपा सर्वत्र। मुदि दाता त्राता सुमति भारत भ्राता पत्र
लाल बलदेव सिंह रीवा राज्य के सेनापति थे और कलमकार भी थे। उन्होंने एक हाथ में कलम और दूसरे हाथ में तलवार का अद्भुत संयोग रचा था। लाल बलदेव सिंह प्रखर बौद्धिक थे। आपकी जन्म शताब्दी 22 जनवरी, 1969 को पूर्ववर्ती विध्यप्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष रहे विद्वान शिवानंद के संयोजन में मनाई गई थी। उस अवसर पर प्रकाशित परिचय पुस्तिका में लाल बलदेव सिंह के व्यक्तित्व एवं कृतित्व का प्रामाणिक वृत्तांत नई पीढ़ी को मिला था। यह उल्लेख करना प्रासंगिक है कि लाल बलदेव सिंह की कीर्ति को विस्मृति से उबार कर जनसाधारण तक पहुँचाने का दायित्व शिवानंद जी ने निभाया
सन 1901 की जनगणना के लिए लाल बलदेव सिंह रीवा राज्य के प्रभारी अधिकारी थे। रीवा में भारतभ्राता पुस्तकालय की स्थापना लाल बलदेव सिंह ने की। रीवा राज्य में सन 1897-99 के घोर अकाल में पीड़ितों को राहत और सहायता पहुँचाने का कर्त्तव्य आपने कुशलतापूर्वक निभाया
सन 1895 में रीवा राज्य का काम काज उर्दू में किए जाने की अव्यावहारिक रीति-नीति को हटाकर देवनागरी लिपि और हिन्दी भाषा में आरंभ कराने का श्रेय लाल बलदेव सिंह को है। भारतभ्राता के सन 1895 के वार्षिक अंक में लाल बलदेव सिंह का भाषा-चिंतन इन शब्दों में प्रकट हुआ “हिन्दी की दीन-हीन दशा सर्व साधारण पर भली-भाँति विदित है। सम्प्रति इसके पाठक गणों की जैसी रुचि और प्रेम हिन्दी भाषा-विषयक ग्रंथों तथा समाचारपत्रों के पठन-पाठन की ओर है, उसे अवलोकन कर, कदापि कोई भलाई की आशा नहीं कर सकता है। अतिरिक्त इसके सरकारी कर्मचारी की क्रूर दृष्टि समाचारपत्रों पर कितनी अधिक है कि जिससे उन्हें एक दिन सकुशल व्यतीत करना एक-एक कल्प के समान होता है। सरकारी नीति की बेड़ी पाँव में इस प्रकार भरी हुई है कि पाँव का हिलना तक कठिन है
आज राजनीति और समाजनीति में जिस तरह धरती पुत्रों के अधिकार पर जोर दिया जाता है, यह न्यायपूर्ण और तर्कसंगत अवधारणा 24 मई, 1895 के भारतभ्राता में लाल बलदेव सिंह की संपादकीय टिप्पणी में ध्यातव्य है राज स्थान में योग्य कर्मचारियों की आवश्यकता’ ‘जिसको 5 रु. मासिक भी न देना चाहिये, क्यो राज स्थान से उसे राजे-महाराजे अथवा राज्य के संरक्षक 50 रु. दिला देते है? क्या देशी राज स्थान गवर्नमेंट का मुँह देखकर 5 की जगह 50 फेंकते हैं। क्या वे गवर्नमेंट के वाक्य को आदर्श वाक्य मानते है? गवर्नमेंट यदि किसी अयोग्य व्यक्ति को भी योग्य लिखकर भेज देती है तो उसे सच ही मानकर स्वीकार कर लेते हैं। गवर्नमेंट से प्रार्थना करने के अतिरिक्त स्वयं भी वे बहुत से परदेशियों को बुलाते हैं, और उन्हें राज्य सेवा देते हैं। देशी राजा-महाराजाओं को अपनी अधीनस्थ प्रजा की दीन-दशा पर अवश्य ध्यान देना चाहिए और उनका स्वत्व देखना चाहिए कि वे राज्य सेवा के लिए किस पद के योग्य योग्यता रखते हैं। योग्यता के अनुसार उन्हें कार्य सौंपना, उचित वेतन देना और भली-भाँति राज्य कार्य लेना निःसन्देह आवश्यक है। राज्य की प्रजा में शिक्षा अनिवार्य कर दी जाए और उन्हें राजनैतिक आदि प्रत्येक विषय की शिक्षा दी जाय
जनसाधारण के हितों के लिए भारतभ्राता संपादक लाल बलदेव सिंह की सोच कितनी प्रखर और मुखर थी, इसका एक उदाहरण है- ‘कचहरियों में अर्जी “स्टैम्प टिकट लगाकर अर्जी देने की जो आज्ञा हुई है, इससे निश्चय ही प्रजा को बड़ी भारी हानि पहुँच रही है। बहुधा ऐसे लोग हैं, जिन्हें अवसर पर एक पैसा मिलना बहुत ही कठिन है। इसके अतिरिक्त यहाँ की सरकार ने यह आज्ञा दी है कि अर्जीनवीसों से अपनी अर्जी लिखवाकर न्यायालय में नहीं देंगे, उनकी अर्जी नहीं ली जाएगी। विचाराधीन बात है कि दीन मनुष्य अर्जी की लिखाई और फिर उसमें स्टैम्प का व्यय क्यों कर दे सकता है। इसका तात्पर्य उनका मुँह बन्द करना है। जो वास्तव में उसके ऊपर अत्याचार है। शीघ्र ही सरकार को यह आज्ञा उठा लेनी चाहिए
भारत के सर्वमान्य नेता दादाभाई नौरोजी को जब ब्रिटेन की संसद का सदस्य चुना गया, तब लाल बलदेव सिंह ने भारतभ्राता में संपादकीय टिप्पणी लिखी। लोकतंत्र की समझ और उसके मर्म की व्याख्या का यह उत्कृष्ट उदाहरण है। दादाभाई नौरोजी ब्रिटिश संसद के लिए फिन्सबरी निर्वाचन क्षेत्र से चुने गए थे। वे लिखते हैं- ‘मिस्टर दादाभाई नौरोजी को हमारी सलाह की आवश्यकता नहीं है तो भी अपना धर्म समझ कर हम इतना कहना आवश्यक समझते हैं कि उनका प्रथम ध्यान फिन्सबरी निवासियों के कार्य की ओर होना चाहिए जिनके कि वे वास्वविक मेम्बर हैं। तत्पश्चात उनकी आज्ञा लेकर के यथासंभव उन्हें अपने देश की दशा पर भी अवश्य ही ध्यान देना उचित है
हिन्दी और समग्र भारतीय पत्रकारिता के ऐसे महान पुरखे की स्मृति को अक्षुण्ण बनाना वर्तमान पीढ़ी का पवित्र कर्तव्य है। माधवराव सप्रे स्मृति समाचारपत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान, भोपाल प्रतिवर्ष लाल बलदेव सिंह की स्मृति में पत्रकारिता के लिए पुरस्कार / सम्मान का संचालन कर रहा है। सप्रे संग्रहालय की यह भी कोशिश रही है कि रीवा में लाल साहब की स्मृति में कोई उपयुक्त स्मारक स्थापित हो रीवा के मुखर पत्रकार श्री जयराम शुक्ल इस अभियान में सहभागी रहे है हम आभारी हैं उपमुख्यमंत्री श्री राजेन्द्र शुक्ल के जिन्होंने हमारे अनुरोध पर लाल बलदेव सिंह की स्मृति को अक्षुण्ण बनाने का निर्णय लिया। उसी का परिणाम है कि माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार संस्थान, भोपाल के रीवा परिसर में निर्मित आधुनिक सभागार का नामकरण ‘लाल बलदेव सिंह सभागृह’ हो गया है

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