औरतों का परदा करना शहीदों के खून से भी ज्यादा अफजल है” क्या धार्मिक जुलूस में शहीदों और महिलाओं को इस तरह कमतर दिखाना उचित है

सितंबर रतलाम, आज रतलाम में ईद मिलादुन्नबी का पर्व मुस्लिम समाज द्वारा धूमधाम से मनाया गया। इस मौके पर समाज द्वारा शहर के विभिन्न भागों में बड़े- बड़े स्टेज सजाए गए जहां पर इस मौके पर निकाले गए जुलूस का स्वागत किया गया। इस मौके पर निकाले गए जुलूस में बड़े पैमाने पर डीजे लगी गाड़ियां भी थी और युवा बड़े पैमाने पर तरह-तरह के झंडे उठाए हुए थे। जुलूस में अनुशासन की पूरी तरह कमी थी जुलूस में कई युवा सिगरेट पीते हुए चल रहे थे जो कि सार्वजनिक स्थल पर धूम्रपान के कानून का उल्लंघन कर रहे थे। पिछले दिनों हुई घटनाओं के मद्दे नजर पुलिस ने सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए थे इन व्यापक इंतजामों की वजह से जगह-जगह बैरीकेटिंग कर दी गई जिसकी वजह से आम आदमी को बहुत परेशानी हुई बीमार लोगों का अस्पताल पहुंचना दूभर हो गया जो प्रशासन और पुलिस की अदूरदर्शिता को परिलक्षित कर रहा था। जुलूस में एक बड़े वाहन पर लगे बैनर ने लगभग सभी जागरूक लोगों का ध्यान आकर्षित किया जो बड़ा चर्चा का विषय रहा लगता है जुलूस के आयोजन मैं आयोजन कर्ता का कोई नियंत्रण नहीं था नहीं तो इस तरह के बैनर लगना मुश्किल था जो शहीदों और महिलाओं के लिए अपमानजनक थे। बैनर का मजमून कुछ इस तरह था “औरतों का परदा करना शहीदों के खून से ज्यादा अफजल है” इसका मतलब यह है कि पर्दा करने वाली औरतें शहीदों के खून से भी ज्यादा श्रेष्ठ है जो के नितांत गलत है और किसी भी धर्म ग्रंथ में इस तरह का उल्लेख नहीं मिलता। औरतों का परदा करना ना करना अपना एक नितांत व्यक्तिगत मामला है पूरी दुनिया में इस पर बहस चल रही है ईरान में भी हिजाब के खिलाफ महिलाओं का बड़ा तगड़ा आंदोलन चला उसके बाद भी कुछ लोगों द्वारा अपने व्यक्तिगत सोच को समाज के इतने बड़े जुलूस में थोपना कदापि उचित नहीं कहा जा सकता है इसके लिए आयोजन कर्ताओं को सोचना चाहिए। क्योंकि जुलूस में शामिल कई महिलाओं द्वारा पर्दा नहीं किया गया था इसके लिए उन्हें पर्दा नशीनों से कमतर आंका जाना कदापि उचित नहीं है। सिख समाज बोहरा समाज और जैन समाज के जुलूस में जिस तरह का अनुशासन होता है काश इस तरह का अनुशासन बाकी समाजों के जुलूस में भी दिखाई दे इसके लिए प्रशासन को प्रयास करना चाहिए नहीं तो समाजों के धार्मिक जुलूस धार्मिक न रहकर शक्ति प्रदर्शन का माध्यम बन जायेंगे जो आगे चलकर पुलिस और प्रशासन के लिए बड़ा सर दर्द साबित होंगे। जब 9 अगस्त को विश्व जनजाति दिवस पर आदिवासी समाज को डीजे नहीं बजाने के लिए मनाया गया और उन्होंने प्रशासन की यह बात मानी तो क्यों कर यह पहल इस जुलूस के लिए भी नहीं की गई इस पर प्रशासन को विचार करना चाहिए। नियम कानून का मखौल उड़ा कर शहर के जनजीवन को बंधक बना देने वाले इस तरह के जुलूस चाहे वह किसी भी समाज से हो किसी भी धर्म से हो को अनुशासित करने की पहल करना आज प्रत्येक धर्म और समाज को इस बारे में चिंतन करने की जरूरत है जिसके लिए प्रत्येक शहरवासी को सोचना चाहिए

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