Interview: दुमका से भाजपा उम्मीदवार सीता सोरेन बोलीं- देवर-देवरानी को आगे बढ़ाया, दोनों कब्जा जमाकर बैठ गए

दुमका लोकसभा क्षेत्र से भाजपा उम्मीदवार और शिबू सोरेन की बड़ी बहू सीता सोरेन इन दिनों झारखंड के साथ ही बिहार और दिल्ली के सियासी गलियारों में खूब चर्चा में हैं। पारिवारिक कलह के छींटे बाहर छिटकते ही भाजपा ने अपने ही सांसद सुनील सोरेन को घर बैठाकर सीता को दुमका से झामुमो के खिलाफ मैदान में उतारा है।

दुमका लोकसभा क्षेत्र से भाजपा उम्मीदवार सीता सोरेन इन दिनों झारखंड ही नहीं, बिहार और दिल्ली के सियासी गलियारों में खूब चर्चा में हैं। वजह है उनके सहारे भाजपा की झामुमो को हिलाने की कोशिश। पारिवारिक कलह के छींटे बाहर छिटकते ही भाजपा ने अपने ही सांसद सुनील सोरेन को घर बैठाकर सीता को दुमका से झामुमो के खिलाफ मैदान में उतार दिया। सीता भी आदिवासियों से लेकर झामुमो के हर समर्थक से कहती नहीं थकतीं कि देवर-देवरानी को हमने खुद बढ़ाया था, मगर उन दोनों ने तो पूरी पार्टी पर ही कब्जा जमा लिया। प्रस्तुत हैं विनीत सक्सेना की सीता सोरेन से हुई सीधी बातचीत के प्रमुख अंश…

देवर-देवरानी से इतनी खफा क्यों हैं? 

खफा नहीं होंगे तो क्या होंगे। पति दुर्गा सोरेन के बाद हमें मौका मिलना चाहिए था। हमने तो खुद हेमंत को रास्ता दिया था। जब हेमंत को उत्तराधिकारी के तौर पर बढ़ाया गया तब भी पूरा समर्थन किया, जबकि गुरुजी की उम्र बढ़ने के बाद तो पति के साथ हमने ही पार्टी को आगे बढ़ाया था। दुर्गा सोरेन ने ही नए ढंग से पूरा संगठन और सिस्टम खड़ा किया। इच्छा थी कि वही मुख्यमंत्री बनेंगे, मगर वे हमेशा के लिए चले गए। सोचा था कि हेमंत आगे बढ़ेंगे तो हमें भी बढ़ाएंगे, मगर उन्होंने तो हमारे ही रास्ते बंद कर दिए। पहले युवा, मजदूर विंग से अलग किया और फिर एक-एक करके पूरे संगठन से भी निपटा दिया। बार-बार लगा कि अब मौका देंगे, मगर कभी छोटे देवर बसंत को आगे बढ़ाया तो कभी अपनी पत्नी कल्पना को। धीरे-धीरे पूरे झामुमो पर काबिज हो गए।

देवर से नाराजगी का हिसाब देवरानी से क्यों?

दोनों मिले हुए हैं। हम तो उन्हें देवरानी जैसा मान ही देते रहे, लेकिन संगठन और काम-काज की एबीसी समझे बगैर उत्तराधिकारियों की कतार में लग गईं।

गुस्सा चुनाव से पहले क्यों फूटा? 

पहले संगठन से काटे गए, लेकिन चुप रहे। फिर उत्तराधिकारी वाली लाइन से हटाए गए। मंत्री बनने का मौका आया तब भी किनारे कर दिया गया। अब विधायक होने के बावजूद टिकट भी नहीं दिया जा रहा था। हेमंत को ईडी ने जेल भेजा तो चंपई सोरेन की ताजपोशी कर दी। कब तक चुप रहते। अब भी खामोश बैठते तो खत्म ही कर दिए जाते, इसलिए मुंह खोलना पड़ा।

चंपई सोरेन तो बड़े नजदीकी हैं, फिर कैसी नाराजगी? 

चंपई सोरेन से नाराजगी नहीं है, लेकिन उनको सीएम बनाने का क्या मतलब था। वह नजदीकी हैं, लेकिन हमारे खानदान-परिवार के थोड़े ही हैं। वह जिलिंगगोरा गांव के हैं। गुरुजी के साथी हैं। हेमंत उन्हें चाचा बोलते हैं, लेकिन वह सगे नहीं हैं। हमें किनारे लगाने के लिए उन्हें आगे बढ़ाया गया।

तस्वीर में सास-ससुर के साथ कल्पना दिखीं, आप क्यों गायब?

सास-ससुर का पूरा आशीर्वाद हमारे साथ है। नेमरा में हुए श्राद्ध कर्म के दौरान भी ससुर और सास दोनों ने कहा-चुनाव लड़ो और जीतो। देवर-देवरानी ने दोनों को हाईजैक कर लिया है। कल्पना ने खुद अपनी तस्वीर खिंचवाकर जारी कर दी। उनके साथ हमारे फोटो भी हैं। पूरे कुनबे ने देखा कि सास-ससुर ने हमें ही बड़ी बहू के तौर पर साथ रखा।

क्या सांसद सुनील का टिकट कटवाने को आप दुमका से लड़ीं? 

हां, दुमका से इसलिए लड़े कि पति दुर्गा की फाइलें लेकर चलने वाला पीए सुनील सोरेन उनके खिलाफ ही चुनाव लड़ा था। उन्हें धोखा दिया था। वक्त-वक्त की बात है। अब भाजपा ने हमें मौका दिया तो हमने हिसाब बराबर कर दिया।

भाजपा से टिकट कैसे मिला, कौन जरिया बना?

हमारा जरिया कोई नहीं, ऊपर वाला है। हमें खुद ऑफर मिला। हमने सीधे बात की। भाजपाई दिग्गजों को मालूम था कि झामुमो और हमारे परिवार में क्या चल रहा है। हमें भी लगा कि कब तक चुप बैठेंगे।

 

 

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