सुशील मोदी भारत के केंद्रीय वित्त मंत्री के पद के योग्य थे लेकिन दुर्भाग्यवश वो बिहार के वित्त मंत्री और उपमुख्यमंत्री बनकर रह गए.”
बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री और वित्त मंत्री सुशील मोदी के बारे में ये शब्द बिहार के वरिष्ठ पत्रकार सुरूर अहमद के हैं.
वो कहते हैं, “सुशील मोदी बिहार में 2005 से लेकर 2013 तक उपमुख्यमंत्री और वित्त मंत्री रहे, जीएसटी एंपावर्ड कमिटी के प्रमुख रहे, जीएसटी आदि आर्थिक विषयों पर वो लेख लिखते रहे. जब वो विपक्ष में थे तो चाहे बजट हो या फिर कुछ और आर्थिक विषय, वो उन पर बात करते थे, सवाल उठाते थे.”
लेकिन आज विश्लेषक उनके राजनीतिक भविष्य पर सवाल उठ रहे हैं.

बीजेपी ने नहीं बनाया राज्य सभा उम्मीदवार
भाजपा नेता रविशंकर प्रसाद से मिलते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
दरअसल पार्टी ने बिहार की राज्यसभा सीटों के लिए होने वाले उप चुनाव के लिए अपने दो उम्मीदवारों का ऐलान कर दिया है.
बीजेपी ने बिहार से डॉक्टर धर्मशीला गुप्ता और डॉक्टर भीम सिंह को राज्यसभा चुनाव के लिए उम्मीदवार बनाया है. इस सूची में सुशील कुमार मोदी का नाम नहीं है. सुशील मोदी का कार्यकाल अप्रैल में पूरा हो रहा है
लोक जनशक्ति पार्टी नेता और केंद्रीय मंत्री रहे रामविलास पासवान की मृत्यु के बाद खाली हुई सीट पर बचे कार्यकाल के लिए साल 2020 में सुशील मोदी को बिहार की राज्यसभा सीट से सांसद बनाया गया था.
अपना कार्यकाल ख़त्म होने के बाद एक ट्वीट में सुशील मोदी ने कहा, “देश में बहुत कम कार्यकर्ता होंगे जिनको पार्टी ने 33 वर्ष तक लगातार देश के चारों सदनों में भेजने का काम किया हो. मैं पार्टी का सदैव आभारी रहूंगा और पहले के समान कार्य करता रहूंगा
इस ट्वीट को कई हलकों में विदाई लेने वाले ट्वीट की तरह पढ़ा गया. सुशील मोदी का पक्ष जानने के लिए हमने उनसे संपर्क करने की कोशिश की लेकिन बातचीत नहीं हो सकी.
बिहार में लालू प्रसाद यादव विरोध के केंद्र में रहे सुशील मोदी पर लंबे वक्त से कई आरोप लगते रहे हैं कि उनके नेतृत्व में भाजपा नीतीश कुमार की बी-टीम बनकर रह गई, वो राज्य में भाजपा का चेहरा नहीं बन पाए, उनके रहते बिहार में कोई नई लीडरशिप नहीं उभर पाई. ऐसे वक्त में जब विधानसभा में बीजेपी की जदयू से ज़्यादा सीटें हैं उसके बावजूद भाजपा ने एक बार फिर नीतीश कुमार के नेतृत्व में सरकार बनाई है.
जेपी आंदोलन से जुड़े रहे सामाजिक कार्यकर्ता सत्यनारायण मदन सुशील मोदी और भाजपा की राजनीतिक सोच से सहमत नहीं हैं, लेकिन वो मानते हैं, “भाजपा की राजनीति में उनका जो योगदान है उसमें तो मानना पड़ेगा और आज भाजपा में जितने चेहरे हैं उनका योगदान उतना नहीं है जितना सुशील मोदी का है. लेकिन फिर भी वो आज अलग-थलग हैं.”
“इस बार जब वो सांसद बने, उनको केंद्र में मंत्री नहीं बनाया गया जबकि वो बिहार भाजपा में वरिष्ठतम नेता हैं. वो एंटी लालू राजनीति के केंद्र में रहे हैं. उनको भाजपा राजनीतिक पद दे नहीं रही है. न (उनकी) केंद्र में जगह है न राज्य में जगह है.”
साल 2013 से 2022 तक सुशील मोदी का मीडिया का काम देख चुके वरिष्ठ पत्रकार राकेश प्रवीर कहते हैं, “उन्हें (सुशील मोदी को) मैं नज़दीक से जानता हूं लेकिन बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व क्या सोच रहा है उसका अनुमान लगाना मुश्किल है. अगर (उन्हें) कोई ज़िम्मेदारी नहीं मिली तो (वो) बहुत कोशिश नहीं करेंगे. हो सकता है कोई किताब लिखें, अखबारों में कॉलम लिखें.”
“व्यक्तिगत तौर पर वो खुद ही कहते थे कि अगर मैं राजनीति में न आया होता तो मैं पत्रकार बनता. बिहार की राजनीति में आज की तारीख में वो हाशिए पर हैं. संसदीय बोर्ड में या कोर कमेटी में, या पार्टी की डिसीज़न मेकिंग टीम में उनकी कोई बड़ी भूमिका नहीं है.”
लेखक और पत्रकार नलिन वर्मा के मुताबिक़ सुशील मोदी के राजनीतिक अंत की बातें 2017 में ही शुरू हो गई थीं.
वो कहते हैं, “सुशील मोदी आडवाणी, वाजपेयी के दिनों के नेता हैं- चाहे वसुंधरा राजे हों, शिवराज सिंह चौहान हों या सुशील कुमार मोदी हों. वो अमित शाह से तो सीनियर हैं हीं और एक तरह के नरेंद्र मोदी के समकालीन हैं. नब्बे के दशक में उनका स्टेचर भी बराबर था. जब भाजपा के अभी के नेतृत्व की नई राजनीति शुरू हुई तो उन्होंने अपने ब्रैंड के नेताओं को बनाना शुरू कर दिया जो उनके वफ़ादार हों.”









